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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के बाद, जिसमें उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें आश्वासन दिया है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा, भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश की ऊर्जा आयात नीतियां पूरी तरह से भारतीय उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा पर केंद्रित हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) ने गुरुवार को एक बयान जारी कर कहा कि वैश्विक ऊर्जा बाजार की अस्थिरता के बीच उपभोक्ताओं को सस्ती और सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार का मुख्य उद्देश्य है।

ट्रंप ने बुधवार को व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान यह दावा किया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत में यह आश्वासन प्राप्त किया है। उन्होंने कहा, “मैं भारत के रूस से तेल खरीदने से खुश नहीं था, क्योंकि इससे रूस को यूक्रेन युद्ध जारी रखने के लिए धन मिलता है। लेकिन मोदी ने मुझे आश्वस्त किया कि वे जल्द ही रूस से तेल खरीदना बंद कर देंगे। यह एक बड़ा कदम है। अब हमें चीन को भी ऐसा ही करने के लिए मनाना होगा।” ट्रंप ने भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ का जिक्र भी किया, जो रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर लगाए गए थे, ताकि मॉस्को पर दबाव बनाया जा सके।

MEA के प्रवक्ता रंधीर जायस्वाल ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, “भारत तेल और गैस का एक बड़ा आयातक देश है। वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य की अस्थिरता में भारतीय उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना हमारी निरंतर प्राथमिकता रही है। हमारी आयात नीतियां पूरी तरह से इसी लक्ष्य से निर्देशित हैं।” उन्होंने जोर दिया कि भारत ऊर्जा स्रोतों को व्यापक बनाने और बाजार की स्थितियों के अनुसार विविधीकरण करने का प्रयास कर रहा है, ताकि कीमतें स्थिर रहें और आपूर्ति निर्बाध बनी रहे।

हालांकि, MEA ने ट्रंप के दावे का सीधा खंडन नहीं किया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच बुधवार को कोई फोन कॉल नहीं हुई। प्रवक्ता जायस्वाल ने कहा कि वे किसी ऐसी बातचीत से अवगत नहीं हैं। इसके अलावा, MEA ने अमेरिका के साथ ऊर्जा सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में अमेरिका से ऊर्जा खरीद में निरंतर वृद्धि हुई है, और वर्तमान ट्रंप प्रशासन ने इस क्षेत्र में गहन सहयोग बढ़ाने में रुचि दिखाई है। “इस दिशा में चर्चाएं चल रही हैं,” जायस्वाल ने कहा।

भारत की ऊर्जा नीति पर यह विवाद कोई नई बात नहीं है। अमेरिका लंबे समय से भारत को रूसी तेल खरीद बंद करने के लिए दबाव बना रहा है, तर्क देते हुए कि ये खरीदें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन संघर्ष के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। सितंबर 2025 में, रूस ने भारत को प्रतिदिन औसतन 1.62 मिलियन बैरल कच्चा तेल निर्यात किया, जो भारत के कुल तेल आयात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। भारत चीन के बाद रूस के कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है।

MEA ने दोहराया कि भारत की ऊर्जा खरीद “राष्ट्रीय हितों” से प्रेरित है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहले भी कहा है कि रूसी तेल की खरीद तब तक जारी रहेगी, जब तक यह आर्थिक रूप से लाभदायक हो। उन्होंने पश्चिमी देशों की दोहरी नीति पर भी सवाल उठाए हैं, जहां वे रूसी गैस खरीदते रहते हैं। MEA ने कहा कि वैश्विक बाजार में उपलब्ध विकल्पों और वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं।

रूस ने भी ट्रंप के दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि भारत की तेल आयात नीतियां उसके राष्ट्रीय हितों पर आधारित हैं। रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा, “हम भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते। भारतीय सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है, और हमारी ऊर्जा सहयोग ऐसी ही जरूरतों के अनुरूप है। रूसी तेल की आपूर्ति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत फायदेमंद है।”

यह घटनाक्रम अमेरिका-भारत संबंधों में ऊर्जा सहयोग की चुनौतियों को उजागर करता है। दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में मजबूत साझेदारी है, लेकिन रूसी तेल खरीद पर मतभेद बने हुए हैं। MEA की प्रतिक्रिया से साफ है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को किसी बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होने देगा, बल्कि उपभोक्ताओं के हितों को सर्वोपरि रखेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति का हिस्सा है, जहां भारत संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास कर रहा है।

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