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रिपोर्टर: गनेश सिंह

OBC : सुप्रीम कोर्ट के ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े एक अहम फैसले के बाद देश भर में प्रशासनिक और कानूनी उलझनें बढ़ गई हैं। इस असमंजस के कारण आईएएस (IAS) अधिकारियों की फाउंडेशन ट्रेनिंग पिछले दो महीने से लगातार अटकी हुई है। सरकार यह स्पष्ट करना चाहती है कि शीर्ष अदालत का यह नया फैसला पुरानी भर्तियों और कैडर आवंटन पर लागू होगा या नहीं। इस कानूनी पेच का असर केवल यूपीएससी (UPSC) तक सीमित नहीं है, बल्कि एसएससी, रेलवे और बैंकिंग परीक्षाओं के साथ-साथ उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रवेश पर भी पड़ सकता है।

क्यों अटकी है आईएएस की ट्रेनिंग और क्या है केंद्र सरकार की चिंता

OBC नियमानुसार आईएएस अधिकारियों की फाउंडेशन ट्रेनिंग अगस्त के तीसरे सप्ताह से शुरू होनी तय थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले के बाद पैदा हुए सवालों के चलते इसे टालना पड़ा। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने इस संबंध में पिछले 14 वर्षों के सिविल सेवा परीक्षाओं के आंकड़े जुटाकर संभावित प्रभावों का आकलन किया है।

केंद्र सरकार ने इस मामले पर स्थिति स्पष्ट कराने के लिए 24 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर 24 सितंबर को सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सरकार की मुख्य चिंता यह है कि यदि नियमों में बदलाव पिछली भर्तियों पर लागू होते हैं, तो पहले से तैनात अधिकारियों की वरिष्ठता और सेवा शर्तों पर गहरा असर पड़ सकता है।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला और क्रीमी लेयर के नए नियम

OBC न्यायालय की बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि केवल माता-पिता के वेतन या आय के आधार पर ही किसी अभ्यर्थी को ओबीसी क्रीमी लेयर के दायरे में नहीं रखा जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद, सामाजिक स्थिति और रोजगार के स्रोतों को भी समग्र रूप से देखना होगा। कोर्ट ने सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच अंतर को अनुचित माना था। इस व्यवस्था से कई ऐसे यूपीएससी अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली थी, जिन्हें पहले अधिक वेतन सीमा के चलते आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया था। हालांकि, इस व्यवस्था के पुराने मामलों पर लागू होने को लेकर स्थिति अभी धुंधली है।

अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षण संस्थानों पर भी मंडरा रहा असर

OBC इस कानूनी स्थिति का प्रभाव केवल सिविल सेवा परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहने की संभावना है। एसएससी, रेलवे और बैंक भर्तियों के अलावा आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में हुए पुराने ओबीसी दाखिलों पर भी इसके सवाल खड़े हो सकते हैं। जिन छात्रों को पूर्व में वेतन सीमा के आधार पर आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया गया था, वे अब अपने मामलों पर पुनर्विचार की मांग कर सकते हैं। फिलहाल सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम स्पष्टीकरण और फैसले पर टिकी हैं, जिसके आने के बाद ही रुकी हुई ट्रेनिंग और प्रशासनिक नियुक्तियों का रास्ता साफ हो सकेगा।

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