by-Ravindra Sikarwar
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शासनकाल में पूर्वोत्तर भारत को न सिर्फ सीमांत क्षेत्र नहीं बल्कि देश के आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक विकास की कड़ी के रूप में देखने की नीति अपनायी है। उनका विजन “विकसित भारत, विकसित पूर्वोत्तर” कई आयामों में आता है: कनेक्टिविटी, निवेश, सतत विकास, शांति, और क्षेत्रीय पहचान का संवर्धन।
मुख्य स्तंभ और उद्देश्य
- आत्मविश्वास और सांस्कृतिक पहचान:
पूर्वोत्तर को “अष्ट लक्ष्मी” के रूप में देखा गया है — आठ तरह की समृद्धियों का प्रतीक, जो कृषि, जैविक उत्पाद, पर्यटन, जंगलों से संसाधन, जल, ऊर्जा आदि क्षेत्रों से जुड़े हैं। मोदी ने क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता, स्थानीय शिल्प, परंपराएँ और लोक जीवन को बढ़ावा देने की पहल की है ताकि वहाँ की पहचान बनी रहे। - कनेक्टिविटी (सड़क, रेल, वायु मार्ग, जलमार्ग):
- कई राष्ट्रीय राजमार्गों और लोकल सड़कों का निर्माण एवं विस्तार किया गया है।
- रेलवे नेटवर्क का विस्तार; विद्युत ट्रैकिंग, ब्रॉड गेेज मार्गों का निर्माण।
- हवाई मार्गों को जोड़ने की योजनाएँ – अधिक एयरपोर्ट, नए मार्ग, क्षेत्रीय विमान सेवाएँ
- जलमार्गों की भूमिका बढ़ाने की पहलें; राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित करना; भारत-आसियान आदि देशों से जुड़ने वाले मौलिक मार्गों का विकास।
3. विकास और निवेश:
- हाल ही में ‘Rising North East Investors Summit’ में कुल लगभग ₹4.3 लाख करोड़ से ज़्यादा का निवेश प्रस्तावित किया गया।
- ऊँची महत्व की परियोजनाएँ: गैस ग्रिड (North East Gas Grid), सेला टनल, कलादन मल्टीमॉडल ट्रांज़िट कॉरिडोर आदि।
- आत्मनिर्भर भारत, उद्योग, MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) को बढ़ावा। स्थानीय उत्पादों जैसे चाय, हल्दी, अदरक, नैसर्गिक टूटी-फूट सह उत्पादों का प्रोत्साहन।
- सामाजिक विकास एवं जीवन-स्तर:
- घर बनाना, बिजली, साफ़ पानी, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्कूलों की स्थापना आदि तरह-किस्म की मूलभूत सुविधाएँ।
- महिलाओं, दलितों, जनजातियों और कमजोर वर्गों की समावेशन। स्वरोजगार, स्व-सहायता समूह को समर्थन।
- शांति एवं सुरक्षा:
- पूर्वोत्तर में लंबे समय से चले आ रहे संघर्षों, अलगाववादी आंदोलनों, असंतोषों को समाप्त करने के लिए बातचीत और शांति प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया गया है। रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख है कि कई युवाओं ने हथियार डाल दिए हैं।
- केंद्र सरकार सीमापार सहयोग बढ़ाने, स्थानीय जनता के साथ संवाद मजबूत करने, स्थानीय समस्याओं का समाधान तेजी से करने की कोशिश कर रही है।
- पर्यावरण-अनुकूल और सतत विकास:
- जैविक कृषि को बढ़ावा देना; पूर्वोत्तर को जैविक खाद्य उत्पादों का बड़ा केंद्र बनाने की कोशिश।
- पर्यटन का संवर्धन, इको-टूरिज्म, ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे आदि मॉडल।
अब तक क्या हुआ है — प्रगति और वास्तविक बदलाव:
- पूर्वोत्तर में कई बड़े बुनियादी ढाँचा प्रोजेक्ट्स पूरे हुए या उनकी आधारशिला रखी गई है, जिनका कुल मूल्य असंख्य करोड़ों रुपये है।
- सड़क, रेल, विद्युत, जल और टेलीकॉम कनेक्टिविटी में उल्लेखनीय सुधार। उदाहरण के लिए, नागालैंड में कुछ वर्षों में कई सौ किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बने।
- राज्य-राज्य और केन्द्रीय योजनाएँ अधिक पहुँच रही हैं; राज्य सरकारों एवं स्थानीय प्रशासन को आर्थिक संसाधन और योजनाओं का लाभ मिल रहा है।
- पूर्वोत्तर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंडलों से जोड़ने वाले प्रयास बढ़ गए हैं (जैसे भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाइवे, कलादन कॉरिडोर।
- नए हवाई मार्ग, ट्रेनों, मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स हब्स की स्थापना हो रही है ताकि माल और लोग दोनों का आवागमन सहज हो सके।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता:
- भौगोलिक कठिनाइयाँ: पूर्वोत्तर भारत में दुर्गम इलाके, पहाड़, घनी जंगलें हैं। सड़कों और रेलवे लाइनें सालों तक निर्माणाधीन रहती हैं। मौसम और भौगोलिक परिस्थितियाँ बाधाएँ उत्पन्न करती हैं।
- औद्योगिक और मानव संसाधन बुनियादी ढांचा: औद्योगिक इकाइयाँ, प्रसंस्करण सुविधा, ठंडा भंडारण, परीक्षण प्रयोगशालाएँ आदि अभी भी अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुँच पाई हैं। स्थानीय कार्यबल को कौशलदेने की ज़रूरत है।
- शांति एवं सामाजिक समावेशन: कुछ क्षेत्रों में असंतोष, आंतरिक संघर्ष और सशस्त्र समूह अभी भी कुछ हद तक सक्रिय हैं। स्थायी शांति सुनिश्चित करना ज़रूरी है।
- प्रदूषण / पर्यावरणीय दबाव: जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रभाव, जैविक खेती को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाये रखना होगा।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तथा सीमा नीति: सीमापार का विस्तार करना है, लेकिन सीमाओं पर नियंत्रण, सुरक्षा, बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर और नीति विशुद्ध होने चाहिए।
मोदी सरकार का पूर्वोत्तर के लिए विजन सिर्फ़ योजनाओं का संग्रह नहीं है — यह एक समग्र परिवर्तन की रूपरेखा है:
- कनेक्टिविटी से लेकर विश्वास तक,
- विकास से लेकर स्थायित्व तक,
- संस्कृति से लेकर पहचान तक।
पूर्वोत्तर अब सिर्फ़ भारत का पिछड़ा क्षेत्र नहीं रहा; वह देश की “विकास की अगली सीमा” बन चुका है। यदि ये योजनाएँ समय पर लागू होती हैं, और स्थानीय लोगों की भागीदारी बनी रहती है तथा पारदर्शिता बनी रहती है, तो यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय विकास में एक प्रेरणास्पद भूमिका निभायेगा।
