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Report by: Ratna Mishra

Saharsa : बिहार की राजनीति में दलितों के बड़े चेहरे माने जाने वाले पूर्व मंत्री रत्नेश सादा अब विवादों के घेरे में हैं। सहरसा जिले के महिषी बलिया सिमर निवासी एक पीड़ित ने पूर्व मंत्री पर सत्ता के रसूख का इस्तेमाल कर करोड़ों की संपत्ति अर्जित करने और गरीबों की पुश्तैनी जमीन हड़पने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। इस मामले ने जिला प्रशासन से लेकर पटना के गलियारों तक हड़कंप मचा दिया है।

Saharsa “2010 से पहले कुछ नहीं था, अब पूरा गांव खरीद लिया”

पीड़ित मोहम्मद शकील का आरोप है कि रत्नेश सादा की संपत्ति में साल 2010 में विधायक बनने के बाद अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई। शकील का दावा है कि पूर्व मंत्री ने आय से अधिक संपत्ति बनाई है और सत्ता के प्रभाव से गांव के कई गरीबों की जमीनों पर कब्जा कर लिया है। पीड़ित ने भावुक होते हुए कहा, “2010 से पहले उनके पास कुछ खास नहीं था, लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने जैसे पूरा गांव ही खरीद लिया हो।” यह आरोप सीधे तौर पर जनप्रतिनिधि की संपत्ति की जांच की मांग की ओर इशारा करता है।

Saharsa 15-20 बीघा जमीन पर अवैध कब्जे का दावा

मामला केवल संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित का कहना है कि उनकी अपनी 15 से 20 बीघा पुश्तैनी जमीन पर दबंगों ने कब्जा जमा लिया है। शकील का आरोप है कि उनकी मेहनत से उगाई गई फसल को भी सरेआम लूट लिया गया। न्याय की गुहार लगाने जब वे महिषी अंचल कार्यालय और जिला प्रशासन के पास पहुँचे, तो उन्हें सिर्फ एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर दौड़ाया गया। पीड़ित के अनुसार, “सीओ बड़ा बाबू के पास भेजते हैं और बड़ा बाबू सीओ के पास, हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।”

Saharsa फर्जी मुकदमे और जान से मारने की धमकी

अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना पीड़ित परिवार के लिए अब जान का जोखिम बन गया है। मोहम्मद शकील ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने अपनी जमीन वापस मांगी, तो उन पर और उनके परिवार पर फर्जी मुकदमे दर्ज करा दिए गए। अब उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। आलम यह है कि पीड़ित अपने ही पैतृक गांव लौटने से कतरा रहा है। सिस्टम की बेरुखी और रसूखदारों के खौफ ने एक आम नागरिक को अपने ही घर में बेगाना बना दिया है।

Saharsa सुशासन पर उठे सवाल: क्या होगी निष्पक्ष जांच?

यह पूरा प्रकरण बिहार के ‘सुशासन’ के दावों पर गंभीर सवालिया निशान लगाता है। क्या एक पूर्व मंत्री का कद इतना बड़ा है कि प्रशासन की आंखें अंधी और कान बहरे हो गए हैं? मोहम्मद शकील की चीख अब प्रशासनिक अधिकारियों की ईमानदारी की परीक्षा ले रही है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि इस मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच हो, ताकि यह साफ हो सके कि यह वास्तव में गरीबों का शोषण है या कोई राजनीतिक रंजिश।

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