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BY: Yoganand Shrivastva

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के रुझानों ने भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे दिया है। 15 वर्षों तक सत्ता के शिखर पर रहने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस बार भाजपा की रणनीति के सामने ढहती नजर आ रही है। कोलकाता की सड़कों पर भगवा रंग और ‘जय श्री राम’ के नारों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल की जनता ने इस बार परिवर्तन की राह चुनी है।


कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार: जनता के आक्रोश की मुख्य वजह

ममता सरकार के पतन का सबसे बड़ा कारण राज्य की बिगड़ती कानून-व्यवस्था को माना जा रहा है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज की हृदयविदारक घटना ने आम जनता के भीतर सुरक्षा को लेकर गहरा डर और गुस्सा पैदा कर दिया। इसके साथ ही, सरकारी भर्तियों में धांधली और ‘सिंडिकेट राज’ जैसे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों ने सरकार की छवि को धूमिल किया। भाजपा इन मुद्दों को जनता की अदालत में ले जाने और यह समझाने में सफल रही कि राज्य को अब पारदर्शी प्रशासन की जरूरत है।

घुसपैठ और तुष्टिकरण: ध्रुवीकरण ने बदली चुनावी दिशा

चुनावों के दौरान ‘घुसपैठ’ और ‘तुष्टिकरण’ भाजपा के सबसे धारदार हथियार साबित हुए। सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ के मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर भाजपा ने मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद किया। वहीं, संदेशखाली जैसी घटनाओं ने टीएमसी पर ‘वर्ग विशेष’ को संरक्षण देने के आरोपों को बल दिया। ममता बनर्जी इन आरोपों का तार्किक जवाब देने के बजाय आक्रामक बचाव करती रहीं, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला और विपक्षी मतों का एक बड़ा हिस्सा उनके पाले में चला गया।

15 साल की सत्ता विरोधी लहर और ‘परिवर्तन’ की मांग

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में 15 साल का कार्यकाल अपने साथ भारी ‘एंटी-इन्कंबैंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) लेकर आता है। लंबे समय से एक ही सरकार के होने से विकास कार्यों की सुस्त रफ्तार और स्थानीय नेताओं की मनमानी ने जनता के बीच असंतोष पैदा कर दिया था। भाजपा ने खुद को एक सक्षम विकल्प के रूप में पेश किया और ‘खेला होबे’ के जवाब में ‘मोदी की गारंटी’ को मजबूती से रखा। रुझान बताते हैं कि बंगाल की जनता अब एक नई विचारधारा और नई कार्यशैली को मौका देने के मूड में है।