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रविन्‍द्र सिंह

Editorial : भारतीय राजनीति में साल 2014 के बाद सत्ता के संचालन का एक नया मॉडल देखने को मिला है। इस मॉडल का मूल मंत्र है—”मुद्दे बदलो, ध्यान भटकाओ और आर्थिक नाकामियों को पर्दे के पीछे छुपाओ।” इतिहास गवाह है कि जब भी किसी हुकूमत के पास रोजगार, बेकाबू महंगाई और घटती आमदनी पर कोई ठोस जवाब नहीं होता, वह बहुसंख्यक आबादी को एक काल्पनिक और भावनात्मक युद्ध में उलझा देती है।

Editorial ‘ब्रेड एंड सर्कस’ का देसी अवतार: जब ‘मंदिर और मीडिया’ बने मनोरंजन के साधन

प्राचीन रोमन साम्राज्य में शासक अपनी जनता को वश में रखने के लिए “ब्रेड एंड सर्कस” (Panem et Circenses) की नीति अपनाते थे। इसका सीधा नियम था—जनता को मुफ्त का थोड़ा अनाज दो, रंगमंच पर उनका मनोरंजन करो और एक काल्पनिक दुश्मन खड़ा कर दो; लोग भारी-भरकम टैक्स भूल जाएंगे।

आज के भारत में इसी का आधुनिक और देसी रूपांतरण देखने को मिल रहा है, जिसे हम “मंदिर और मीडिया” का कॉकटेल कह सकते हैं। युवा नौकरियों के लिए भटक रहे हैं, लेकिन मुख्यधारा के टीवी चैनलों पर दिन-रात इस बात पर नॉन-स्टॉप बहस होती है कि किसने किस धर्म या महापुरुष पर क्या टिप्पणी की। ईंधन के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन नैरेटिव (विमर्श) को इतनी चालाकी से घुमा दिया जाता है कि जनता का गुस्सा अर्थव्यवस्था पर नहीं, बल्कि अपने ही पड़ोसी की थाली पर फूटने लगता है। अगर देश का नागरिक सिर्फ 6 महीने लगातार वास्तविक मुद्दों पर अड़ जाए, तो देश की आधी राजनीति वेंटिलेटर पर आ जाएगी।

Editorial अप्रत्यक्ष कर का मायाजाल (The Indirect Tax Trap): जेब भी कटी और दर्द भी नहीं हुआ

आज की कर व्यवस्था ने एक बेहद चतुर रास्ता निकाला है। सरकार ने सीधे करों (Income Tax) का बोझ बढ़ाने के बजाय आम आदमी की रोजमर्रा की सांसों पर अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax/GST) लगा दिया है। आज देश का एक आम रिक्शा चालक और दुनिया का सबसे अमीर उद्योगपति, दोनों जब सुबह उठकर टूथपेस्ट खरीदते हैं या चाय की पत्ती लाते हैं, तो लगभग बराबर टैक्स चुकाते हैं। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘रिग्रेसिव टैक्सेशन’ कहते हैं, जहाँ गरीब की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाता है।

इस ‘टैक्स ट्रैप’ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि आम आदमी को भ्रम रहता है कि वह तो टैक्स देता ही नहीं। रसोई गैस, पेट्रोल, दूध, साबुन और मोबाइल रिचार्ज के जरिए हर नागरिक की जेब से लगातार पैसे निकाले जा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जब जेब कटती थी तो शोर होता था, अब डिजिटल ट्रांजैक्शन और छुपे हुए टैक्स के कारण दर्द का अहसास ही नहीं होता। यह बिल्कुल उस जेबकतरे जैसा है जो पहले चौराहे पर तमाशा दिखाकर भीड़ जुटाता है और फिर मुस्कुराते हुए हाथ साफ कर देता है।

Editorial ‘नागरिक’ से ‘भक्त’ बनने का सफर: लोकतंत्र का सबसे खतरनाक ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’

इस व्यवस्था का तीसरा और सबसे घातक प्रहार जनता के मनोविज्ञान पर हुआ है। आधुनिक राजनीति ने बड़ी चालाकी से जनता को एक सजग ‘नागरिक’ (Questioner) से बदलकर एक कट्टर ‘समर्थक’ (Defender) में तब्दील कर दिया है। एक सच्चे नागरिक का धर्म होता है सरकार से सवाल पूछना, लेकिन एक समर्थक का काम होता है सरकार की हर नाकामी का बचाव करना।

यह लोकतंत्र का एक ऐसा ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’ है, जिसने जनता को अपनी ही तकलीफों को ‘राष्ट्रभक्ति’ समझने पर मजबूर कर दिया है। आज का समीकरण कुछ ऐसा बन चुका है:

  • रसोई गैस और पेट्रोल महंगा? – देशहित के लिए त्याग।
  • नौकरियां खत्म? – आत्मनिर्भर बनो, पकौड़े तलो।
  • अस्पताल और इलाज महंगे? – योग करो, बीमार ही मत पड़ो।

चुनावी मौसम आते ही हजारों करोड़ रुपये के विज्ञापनों और ‘नैरेटिव इन्वेस्टमेंट’ (IT सेल, डेटा मैनेजमेंट) के दम पर देश को चमचमाता हुआ दिखाया जाता है। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, मुफ्तखोरी का बिल महंगाई और नए टैक्स के रूप में उसी आम आदमी को थमा दिया जाता है।

आजादी के समय जब नेहरू का भारत सचमुच गरीब और टूटा हुआ था, तब सरकार भविष्य की उम्मीदें बेचती थी—IIT, ISRO, कारखाने और बांध बनाने की बात करती थी। आज जब देश खुद को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहता है, तब जनता को ‘त्याग और सहन’ करने का डर बेचा जा रहा है। जिस दिन जनता सरकार की आलोचना को ‘देश की आलोचना’ मानकर सवाल पूछना बंद कर देती है, उसी दिन लोकतंत्र दम तोड़ देता है। फिर महंगाई ‘प्रसाद’ और बेरोजगारी ‘देशसेवा’ नजर आने लगती है।

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