By: Ravindra Singh
Rishi Panchami : भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत आत्मशुद्धि, प्रायश्चित और जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना से जुड़ा हुआ है। खासतौर पर महिलाओं में इस व्रत को लेकर विशेष आस्था देखने को मिलती है। हालांकि, पुरुष भी श्रद्धा के साथ ऋषि पंचमी का व्रत रख सकते हैं।

कब मनाई जाएगी ऋषि पंचमी?
Rishi Panchami पंचांग के अनुसार, हर वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह पर्व 15 सितंबर को मनाया जा रहा है। इस अवसर पर कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ ऋषि यानी सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है। कई परंपराओं में वशिष्ठ ऋषि की पत्नी माता अरुंधती का भी पूजन और स्मरण किया जाता है।
महिलाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ऋषि पंचमी?
Rishi Panchami धार्मिक परंपराओं में ऋषि पंचमी को शुद्धि और प्रायश्चित से संबंधित व्रत माना गया है। प्राचीन मान्यताओं में रजस्वला अवस्था के दौरान अनजाने में धार्मिक नियमों का पालन न हो पाने को दोष से जोड़कर देखा जाता था। इसी मान्यता के आधार पर ऋषि पंचमी के दिन व्रत और पूजा के जरिए क्षमा प्रार्थना करने की परंपरा विकसित हुई।
महिलाएं इस दिन अपने जाने-अनजाने हुए अपराधों या भूलों के लिए सप्तऋषियों से क्षमा मांगती हैं। इसे मुख्य रूप से आत्मशुद्धि और प्रायश्चित का अवसर माना जाता है। हालांकि, इस व्रत को केवल महिलाओं तक सीमित नहीं माना गया है।
दातुन और स्नान की पारंपरिक विधि
Rishi Panchami ऋषि पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, इस दिन अपामार्ग यानी चिरचिटा की टहनी से दातुन करने का विधान बताया गया है। पारंपरिक विधि में 108 दातुन का उल्लेख मिलता है।
कुछ परंपराओं में दातुन को सिर पर रखकर 108 बार जल डालकर स्नान करने की बात कही गई है। इसके बाद सामान्य जल से स्नान किया जाता है। मिट्टी, गोबर, आंवला और तुलसी के पत्तों से स्नान करने की परंपरा भी कुछ स्थानों पर देखने को मिलती है। वर्तमान समय में श्रद्धालु इन विधियों को अपनी सुविधा के अनुसार प्रतीकात्मक रूप से भी कर सकते हैं।
इस तरह करें सप्तऋषियों का पूजन
Rishi Panchami पूजा शुरू करने से पहले पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। उस पर हल्दी, रोली या कुमकुम से पूजा का मंडल बनाया जा सकता है।
सप्तऋषियों के प्रतीक के तौर पर सात सुपारी, सात कुश के गट्ठे या सप्तऋषियों की तस्वीर स्थापित करें। इच्छानुसार माता अरुंधती और गुरु की तस्वीर भी रखी जा सकती है।
जल और पंचामृत से करें अर्पण
Rishi Panchami पूजा के दौरान सबसे पहले सप्तऋषियों के प्रतीक को शुद्ध जल अर्पित करें। इसके बाद पंचामृत से अभिषेक करें। चंदन, अक्षत, फूल और माला चढ़ाएं। धूप और घी का दीपक जलाकर विधि-विधान से पूजा करें।
नैवेद्य के लिए मौसमी फल और पंचमेवा अर्पित किए जा सकते हैं। सप्तऋषियों का स्मरण करते हुए मंत्र जाप और अर्घ्य देने की भी परंपरा है। 2026 में पूजा का शुभ समय सुबह 11:07 बजे से दोपहर 1:33 बजे तक बताया गया है।
कथा सुनने के बाद करें क्षमा प्रार्थना
पूजा के बाद ऋषि पंचमी की कथा पढ़ना या सुनना शुभ माना जाता है। इसके बाद सप्तऋषियों की आरती करें और पूरे वर्ष में जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
अंत में भगवान को अर्पित प्रसाद परिवार के सदस्यों में बांटें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अपनी क्षमता के अनुसार ब्राह्मण को भोजन कराने या जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा भी है।
ऋषि पंचमी का संदेश
ऋषि पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परंपरागत रूप से आत्मचिंतन और अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगने का अवसर भी मानी जाती है। श्रद्धालु इस दिन सप्तऋषियों का स्मरण कर सदाचार, संयम और सकारात्मक जीवन की प्रेरणा लेने का प्रयास करते हैं।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और उपलब्ध पंचांग संबंधी विवरणों पर आधारित है। इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।
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