By: Ravindra Singh
Hartalika Teej : हरतालिका तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर शिव-पार्वती की पूजा के साथ व्रत कथा सुनने और पढ़ने का भी विशेष महत्व माना जाता है।
साल 2026 में हरतालिका तीज 14 सितंबर को मनाई जा रही है। इस दिन सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक पूजा का शुभ समय रहेगा। वहीं प्रदोष काल में शाम 5:54 बजे से रात 8:22 बजे तक पूजा का मुहूर्त रहेगा। आइए जानते हैं हरतालिका तीज की संपूर्ण व्रत कथा।
हरतालिका तीज की पौराणिक कथा
Hartalika Teej पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण उन्हें पार्वती नाम मिला। बचपन से ही उनका मन भगवान शिव की भक्ति में लगा रहता था और उन्होंने महादेव को पति रूप में पाने का संकल्प ले लिया था।
माता पार्वती की कठिन तपस्या देखकर उनके पिता पर्वतराज हिमालय चिंतित रहने लगे। उन्हें अपनी बेटी के विवाह की भी चिंता थी। इसी दौरान देवर्षि नारद उनके पास पहुंचे। पर्वतराज ने अपनी पुत्री के विवाह को लेकर उनसे चर्चा की।
देवर्षि नारद ने पार्वती के लिए भगवान विष्णु को योग्य वर बताया। पर्वतराज को यह प्रस्ताव पसंद आया और उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने पार्वती को भगवान विष्णु से विवाह तय होने की बात बता दी।
विवाह का समाचार सुनकर दुखी हुईं माता पार्वती
Hartalika Teej जब माता पार्वती को अपने विवाह का समाचार मिला तो वह बेहद दुखी हो गईं। उन्होंने पहले ही भगवान शिव को अपने मन में पति के रूप में स्वीकार कर लिया था। अपनी परेशानी उन्होंने अपनी सखी को बताई।
माता पार्वती की इच्छा जानकर उनकी सखी उन्हें अपने साथ एक घने वन में ले गई। वहां एक गुफा थी, जहां माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या शुरू कर दी।
रेत से शिवलिंग बनाकर की शिव आराधना
Hartalika Teej मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग बनाया और पूरी श्रद्धा से भगवान शिव की पूजा की। उन्होंने इस दिन निर्जला व्रत रखते हुए महादेव को पति रूप में पाने की कामना की।
माता पार्वती की अटूट भक्ति, तपस्या और संकल्प से भगवान शिव प्रसन्न हुए। इसके बाद महादेव ने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। भगवान शिव की स्वीकृति मिलने के बाद माता पार्वती ने अपना व्रत पूरा किया।
पर्वतराज ने स्वीकार किया माता पार्वती का निर्णय
Hartalika Teej दूसरी ओर, पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री को खोजते हुए उस स्थान तक पहुंच गए जहां माता पार्वती तपस्या कर रही थीं। उन्होंने पार्वती से घर छोड़कर वन में आने का कारण पूछा।
माता पार्वती ने अपने पिता को बताया कि वह भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही थीं और महादेव ने उनका वरण कर लिया है। यह सुनकर पर्वतराज ने अपनी पुत्री की इच्छा को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी और माता पार्वती का विवाह भगवान शिव से करने का निर्णय लिया। आगे चलकर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ।
इसलिए पड़ा ‘हरतालिका’ नाम
Hartalika Teej धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती की सखी उन्हें अपने साथ वन में ले गई थीं। इसी वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा। ‘हरत’ का संबंध हरने या ले जाने से और ‘आलिका’ का अर्थ सखी या महिला मित्र से जोड़ा जाता है।
इसी पौराणिक प्रसंग की वजह से हरतालिका तीज पर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा के साथ उनकी कथा सुनने-पढ़ने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत करने से दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है।
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