रिपोर्टर: गनेश सिंह
Delhi : उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित सुप्रसिद्ध वृंदावन के श्री बांके बिहारी महाराज जी मंदिर में दान की धनराशि को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर में चढ़ाया जाने वाला एक-एक पैसा सीधे मंदिर के खजाने में ही जमा होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मंदिर के प्रबंधन एवं प्रशासन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक निर्देश जारी किया।
चढ़ावे की हेराफेरी पर रोक, ऑनलाइन या दानपेटी के जरिए जमा होगी राशि
Delhi अदालत ने मंदिर में दान की रकम में कथित गड़बड़ियों और हेराफेरी के आरोपों पर कड़ा संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशित किया है कि मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा दिया जाने वाला दान केवल दानपेटियों में डाला जाए या फिर आधिकारिक ऑनलाइन माध्यमों से सीधे मंदिर के खाते में जमा हो।

पीठ ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सेवायतों या किसी भी अन्य व्यक्ति की ओर से इस प्रक्रिया में कोई रुकावट या बाधा डालने की कोशिश की गई, तो उसे अदालत द्वारा अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा।
पारदर्शी व्यवस्था लागू करने और संपत्ति खरीद पर पूर्व अनुमति के निर्देश
Delhi गड़बड़ियों को रोकने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने बांके बिहारी मंदिर की प्रबंधन समिति को एक पारदर्शी प्रणाली विकसित करने का आदेश दिया है, ताकि सभी प्रकार के चढ़ावों का सटीक और सही हिसाब-किताब रखा जा सके।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर से जुड़ा कोई भी व्यक्ति चढ़ावे की राशि खजाने में जमा होने से पहले उसे अपने पास नहीं रख सकता। इसके अतिरिक्त, मंदिर के फंड का उपयोग करके संपत्ति खरीदने का कोई भी प्रस्ताव पूरा करने से पहले न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा।
मंदिर प्रबंधन समिति के प्रशासनिक ढांचे में पूर्व में हुआ था बदलाव
Delhi उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व मई महीने में भी सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव किए थे। अदालत ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया था कि बांके बिहारी मंदिर की उच्च स्तरीय समिति (हाई पावर कमेटी) में गोस्वामी समाज के प्रतिनिधियों का चयन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होगा।
समिति में प्रतिनिधियों के चयन के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी नहीं चलेगी और चुने हुए प्रतिनिधि ही गोस्वामी समाज की आवाज बनेंगे। सर्वोच्च न्यायालय के इन फैसलों से मंदिर के चढ़ावे और प्रशासनिक कार्यों में पूर्ण पारदर्शिता आने की उम्मीद है।

