Report by: Avinash Srivastwa
Rohtas : बिहार के रोहतास जिले में स्वास्थ्य विभाग के सर्वोच्च पद पर बैठे अधिकारी विवादों के घेरे में हैं। सासाराम सदर अस्पताल के सिविल सर्जन (CS) डॉ. मणिराज रंजन पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने और पद का दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप लगे हैं। यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक समाजसेवी ने दस्तावेजों के साथ उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस खुलासे के बाद जिले के प्रशासनिक महकमे और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है।

Rohtas ₹6.71 करोड़ की ‘स्वीकारोक्ति’ बनी गले की हड्डी
भ्रष्टाचार का यह पूरा मामला सिवान जिले में दर्ज एक पुरानी प्राथमिकी से जुड़ा है। मानव हित पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और समाजसेवी मनोज पाठक ने सिवान मुफस्सिल थाने की कांड संख्या 38/2024 का हवाला देते हुए चौंकाने वाले दावे किए हैं। उनके अनुसार, 4 फरवरी 2024 को डॉ. मणिराज रंजन ने खुद एक केस दर्ज कराया था, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने गोपालगंज निवासी एक व्यक्ति को विभिन्न माध्यमों से 6.71 करोड़ रुपये दिए थे।

समाजसेवी का सवाल है कि एक सरकारी पद पर तैनात डॉक्टर के पास इतनी बड़ी नकद राशि और बैंक बैलेंस कहाँ से आया? पुलिस की पर्यवेक्षण रिपोर्ट में भी इस लेन-देन की पुष्टि होने की बात कही जा रही है, जो अब सिविल सर्जन के लिए बड़ी मुश्किल बन सकती है।
Rohtas प्रधानमंत्री कार्यालय से आर्थिक अपराध इकाई तक पहुंची शिकायत
मामले की गंभीरता को देखते हुए समाजसेवी मनोज पाठक ने केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने एक विस्तृत पत्र लिखकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), बिहार स्वास्थ्य विभाग, प्रमंडलीय आयुक्त, जिलाधिकारी रोहतास और आर्थिक अपराध इकाई (EOU) को मामले की उच्च स्तरीय जांच के लिए आवेदन दिया है।
पाठक का आरोप है कि डॉ. रंजन के कार्यकाल के दौरान रोहतास जिले में भी कई वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। उन्होंने मांग की है कि सीएस की पूरी चल-अचल संपत्ति की जांच हो ताकि जनता के टैक्स के पैसों की बंदरबांट करने वालों का चेहरा बेनकाब हो सके।
Rohtas सवाल पूछने पर पत्रकारों और समाजसेवी को मिली धमकी
जब इस गंभीर मामले पर सिविल सर्जन डॉ. मणिराज रंजन का पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। स्पष्टीकरण देने के बजाय सिविल सर्जन आपा खो बैठे और पत्रकारों पर ही भड़क गए। उन्होंने किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया और उल्टा शिकायतकर्ता व पत्रकारों पर ही एफआईआर दर्ज कराने की धमकी दे डाली।
अधिकारी का यह रुख दाल में कुछ काला होने के संदेह को और पुख्ता कर रहा है। मामले को दबाने की कोशिश और सत्ता के रसूख का इस्तेमाल करने की चर्चाएं अब आम हो गई हैं।
Rohtas क्या विभाग करेगा सख्त कार्रवाई?
फिलहाल रोहतास स्वास्थ्य विभाग में इस बात को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है कि क्या शासन अपने ही अधिकारी पर शिकंजा कसेगा या इस रसूखदार मामले को फाइलों में दबा दिया जाएगा। यदि आर्थिक अपराध इकाई (EOU) इस मामले को अपने हाथ में लेती है, तो सिविल सर्जन की गिरफ्तारी की नौबत भी आ सकती है। बिहार सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ ऑन करप्शन की नीति के लिए यह मामला एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।
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