Report by: Ishu Kumar
Dumka : संथाल परगना की वादियों और घने जंगलों के बीच बसी संताल जनजाति के लिए ‘शिकार’ केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व, न्याय और वीरता की पहचान है। इसे स्थानीय भाषा में ‘दिशोम सेंदरा’ कहा जाता है। साल में एक बार आयोजित होने वाला यह पारंपरिक उत्सव आदिवासियों की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का वह अटूट हिस्सा है, जिसे वे अपने पूर्वजों की विरासत मानते हैं। वर्तमान में दुमका जिले के काठीकुंड और गोपीकांदर जैसे क्षेत्रों के पहाड़ों में सेंदरा का जत्था इस प्राचीन रीति का निर्वहन कर रहा है।
आस्था और परंपरा का अनूठा संगम: क्या है दिशोम सेंदरा?
Dumka जानकारों के अनुसार, ‘दिशोम सेंदरा’ प्रकृति पूजा का ही एक रूप है। आदिवासी समुदाय के पुरुष मार्च से मई के महीने में ‘दिसोम देहरी’ (पुजारी) के नेतृत्व में जंगलों की ओर निकलते हैं। यह परंपरा महज़ एक शौक नहीं है, बल्कि इससे आदिवासियों की न्यायिक, वंशानुगत और सुरक्षा संबंधी मान्यताएं जुड़ी हैं। आमडापाडा क्षेत्र के अलुबेडा गांव के गुरु (पुजारी) गुंडा देहरी वर्तमान में काठीकुंड के विभिन्न हाट-बाजारों में ‘सखुआ के पत्ते’ घुमाकर लोगों को 12 और 13 अप्रैल को होने वाले सेंदरा की जानकारी दे रहे हैं। सखुआ का पत्ता घूमना इस बात का प्रतीक है कि समुदाय को एकजुट होकर परंपरा का पालन करना है।
इस परंपरा की कुछ खास विशेषताएं इसे अन्य आयोजनों से अलग बनाती हैं:
- वर्जनाएं: सेंदरा में महिलाओं का शामिल होना पूरी तरह वर्जित है।
- सहयोगी: शिकार दल के साथ उनके पालतू कुत्ते भी शामिल होते हैं, जो घने जंगलों में उनकी सहायता करते हैं।
- पारंपरिक हथियार: इसमें बंदूक जैसे आधुनिक हथियारों का प्रयोग नहीं होता; तस्कर केवल तीर-धनुष, भाला, लाठी, कुल्हाड़ी और गुलेल जैसे पारंपरिक हार्वे हथियारों का उपयोग करते हैं।
कठिन जीवनशैली और सामूहिक भोज की संस्कृति
Dumka जंगलों में शिकार के लिए निकला यह जत्था बेहद सादगी और अनुशासन के साथ रहता है। सेंदरा के दौरान दल के सदस्यों का मुख्य भोजन सत्तू और महुआ के फूलों से बना ‘लाठे’ होता है। रात के समय भात (चावल) खाने की परंपरा है। शिकार दल किसी घर में रुकने के बजाय जंगल के चिन्हित क्षेत्रों में खुले आसमान के नीचे ही विश्राम करता है।
निकलने से पहले वे जंगल और पहाड़ के देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। शिकार के बाद प्राप्त मांस को सबसे पहले देवताओं और पूर्वजों को अर्पित किया जाता है, जिसके बाद इसे पूरे समुदाय के बीच समान रूप से साझा किया जाता है। यह ‘साझा करने की संस्कृति’ आदिवासियों के बीच आपसी भाईचारे और समानता के संदेश को पुख्ता करती है।
संस्कृति बनाम कानून: एक बड़ी चुनौती
Dumka दिशोम सेंदरा का एक पहलू कानूनी पेचीदगियों से भी जुड़ा है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत जंगली जानवरों का शिकार करना अवैध है, लेकिन आदिवासी समाज इसे अपनी संस्कृति और अधिकारों का अभिन्न अंग मानता है। बदलते समय के साथ जागरूकता बढ़ी है, फिर भी यह परंपरा सामूहिक रूप से निभाई जा रही है। पुजारी गुंडा देहरी का कहना है कि यह परंपरा उनके जीवन और प्रकृति के बीच के गहरे संबंधों को दर्शाती है। उनके अनुसार, सेंदरा केवल शिकार नहीं बल्कि जंगल के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक माध्यम है।
दुमका के कुंडरापहाड़, गुमरा पहाड़ और महुआगढ़ी के जंगलों में आज भी गूंजते ढोल-नगाड़े और तीर-धनुष लिए आदिवासियों का जत्था इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के दौर में भी वे अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़े हुए हैं।
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