Report by: Sanjeev Kumar
Bokaro : रामनवमी के पावन अवसर पर जहाँ पूरे देश में भक्ति की बयार बह रही है, वहीं बोकारो के सिटी पार्क स्थित संकट मोचन पहलवान अखाड़ा में एक अनूठी परंपरा देखने को मिली। यहाँ रामनवमी के शुभ अवसर पर सुंदर कांड पाठ का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालुओं और अखाड़े से जुड़े पहलवानों ने हिस्सा लिया। यह अखाड़ा अपनी विशिष्ट कार्यशैली और अनुशासित परंपराओं के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात है।
देश सेवा का केंद्र: अखाड़े से पुलिस और पैरामिलिट्री तक का सफर
Bokaro यह पहलवान अखाड़ा केवल कुश्ती के दांव-पेच सिखाने की जगह नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र सेवा का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। इस अखाड़े में बजरंगबली की आराधना कर पसीना बहाने वाले दर्जनों युवा आज भारतीय पुलिस और विभिन्न पैरामिलिट्री फोर्सेज (अर्धसैनिक बलों) में अपनी सेवा दे रहे हैं। यहाँ की मिट्टी से निकले पहलवानों ने न केवल खेलों में, बल्कि देश की सुरक्षा में भी अपना परचम लहराया है।
अनूठी परंपरा: अखाड़े की सीमा नहीं लांघता यहाँ का ध्वज
Bokaro संकट मोचन पहलवान अखाड़ा अपनी कुछ खास मान्यताओं के लिए जाना जाता है। जानकी राय, जो लंबे समय से यहाँ अपनी सेवा दे रहे हैं, बताते हैं कि रामनवमी के दिन बजरंगबली की विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के ध्वज को बदलने की परंपरा है। दिलचस्प बात यह है कि यहाँ का पवित्र ध्वज अखाड़े की सीमा से बाहर नहीं जाता; इसे परिसर के भीतर ही पूरी श्रद्धा के साथ बदला जाता है। पूजा के उपरांत अखाड़े में पहलवानी के मुकाबलों का भी आयोजन किया जाता है, जो शारीरिक सौष्ठव और खेल भावना का प्रतीक है।
इतिहास: भूतपूर्व सैनिक की विरासत से आज का स्वरूप
Bokaro अखाड़े की नींव और इसके विकास की कहानी काफी पुरानी है।
- स्थापना: इसकी स्थापना पटना निवासी और भूतपूर्व सैनिक जगनारायण पहलवान द्वारा की गई थी।
- विस्तार: 1976 में इस अखाड़े का विस्तार हुआ।
- विकास: जानकी राय, जो स्वयं 1979 से इस अखाड़े से जुड़े हैं, बताते हैं कि भगवान बजरंगबली की असीम कृपा से यहाँ भव्य मंदिर की स्थापना हुई और धीरे-धीरे यह एक बड़े संस्थान के रूप में विकसित हुआ।
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