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Report by: Yogendra Singh

Ambikapur : छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जिले में स्थित अमेरा कोयला खदान क्षेत्र इन दिनों एक बड़े विवाद के केंद्र में है। कोयला लोडिंग के लिए आने वाले ट्रक चालकों ने आरोप लगाया है कि उनसे पार्किंग के नाम पर अवैध रूप से धन उगाही की जा रही है। ईसा अहमद की रिपोर्ट के अनुसार, खदान क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक ट्रक से ₹100 की वसूली की जा रही है, जिसका कोई आधिकारिक आधार या वैध रसीद नहीं दी जा रही है।

प्रतिदिन यहाँ से सैकड़ों ट्रक गुजरते हैं, जिससे यह गणित हजारों से निकलकर लाखों रुपये प्रति माह तक पहुँच रहा है। इस मामले ने स्थानीय प्रशासन और कोयला कंपनियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बिना रसीद के चल रहा है वसूली का ‘सिंडिकेट’

Ambikapur खदान क्षेत्र में पहुंचने वाले ट्रक चालकों का कहना है कि पार्किंग की कोई सुव्यवस्थित जगह न होने के बावजूद उनसे नियमित रूप से पैसे लिए जाते हैं। चालकों का आरोप है कि यदि वे पैसे देने से मना करते हैं, तो उन्हें लोडिंग प्रक्रिया में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस वसूली के बदले में चालकों को कोई आधिकारिक रसीद नहीं दी जाती, जो सीधे तौर पर इसे ‘अवैध वसूली’ की श्रेणी में खड़ा करता है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा किन रसूखदारों की जेब में जा रहा है।

पंचायतों के विरोधाभासी बयान: विकास या अवैध कमाई?

Ambikapur इस मामले में स्थानीय ग्राम पंचायतों की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही है। अलग-अलग पंचायतों के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर विरोधाभासी बयान दिए हैं:

  • पुहपुटरा पंचायत: यहाँ के सरपंच पुत्र ने स्पष्ट रूप से किसी भी प्रकार की वसूली से इनकार किया है और कहा है कि यदि ऐसा हो रहा है, तो यह गलत है और इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से की जाएगी।
  • पीपरकर पंचायत: इसके विपरीत, यहाँ के सरपंच ने स्वीकार किया है कि गांव के विकास कार्यों के लिए ट्रकों से राशि ली जा रही है।

एक ही क्षेत्र की दो पंचायतों के अलग-अलग रुख ने मामले को और अधिक पेचीदा बना दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या किसी पंचायत को सड़क पर ट्रकों से पैसा वसूलने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है?

CSR फंड और पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल

Ambikapur अमेरा खदान क्षेत्र में हो रही इस वसूली ने CSR (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के क्रियान्वयन पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। नियमानुसार, खदान संचालित करने वाली कंपनियों को अपने मुनाफे का एक हिस्सा स्थानीय गांवों के विकास (सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य) पर खर्च करना होता है।

स्थानीय निवासियों का तर्क है कि:

  • यदि कंपनियां CSR मद से पर्याप्त विकास कार्य कर रही हैं, तो फिर गांव के विकास के नाम पर ट्रकों से अवैध वसूली की जरूरत क्यों पड़ रही है?
  • क्या कंपनियां अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन सही ढंग से नहीं कर रही हैं?
  • इस वसूली की आड़ में क्या CSR के फंड की बंदरबांट को छिपाया जा रहा है?

ग्रामीणों और ट्रक यूनियनों ने जिला प्रशासन से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच और पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की मांग की है।

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