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By: Ravindra Sikarwar

अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण के साथ ही अब उन हजारों रामभक्तों और कारसेवकों को सदा के लिए श्रद्धांजलि देने की तैयारी शुरू हो गई है, जिन्होंने सदियों के संघर्ष में अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने घोषणा की है कि आगामी तीन महीनों के अंदर रामजन्मभूमि परिसर में कारसेवकों की स्मृति में एक अत्यंत सुंदर और भव्य स्मारक बनकर तैयार हो जाएगा। यह स्मारक उन सभी ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों को समर्पित होगा, जिनके रक्त की एक-एक बूंद से राम मंदिर का स्वप्न साकार हुआ है।

आलोक कुमार ने गहरे भावुक स्वर में कहा कि पांच सौ वर्षों का लंबा इंतजार, अनगिनत आंदोलन, जेल यात्राएं और अंततः 1990 तथा 1992 के दौरान हुए बलिदानों के बाद आज रामलला अपने मूल स्थान पर विराजमान हैं। विशेष रूप से 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश पर हुई गोलीबारी में सैकड़ों कारसेवक घायल हुए और कई ने सीने पर गोली खाकर प्राण त्याग दिए। उस दिन कोठारी बंधु (रामकुमार और शरदकुमार) के साथ-साथ अन्य तीन कारसेवक भी शहीद हुए थे। आलोक कुमार ने कहा, “ये नाम सिर्फ़ प्रतीक हैं, असल में हजारों रामभक्तों ने अपने घर-परिवार छोड़कर, नौकरी-व्यवसाय त्यागकर और अंत में प्राण तक दे दिए। उनके त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता।”

राम मंदिर परिसर के परकोटे में पहले से ही सप्त ऋषि मंदिर स्थापित हैं, जिनमें महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य जैसे गुरुओं के साथ-साथ भगवान राम के परम भक्तों और मित्रों को स्थान मिला हुआ है। अब परिसर में चार और विशाल मंदिर बनाए जाने की योजना है। इनमें महर्षि वाल्मीकि (जिन्होंने रामकथा की रचना की), निषादराज गुह (राम के सखा), देवी अहिल्या (जिन्हें राम ने मुक्ति दी) तथा माता शबरी (जो राम की भक्ति की पराकाष्ठा हैं) के भव्य मंदिर शामिल हैं। आलोक कुमार ने बताया कि राम के जीवन में इन पात्रों का योगदान अविस्मरणीय है, इसलिए इन्हें भी भव्य रूप में स्थापित किया जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनके चरित्र से प्रेरणा ले सकें।

स्वर्गीय अशोक सिंघल जी की स्मृति को याद करते हुए आलोक कुमार ने बताया कि जब चारों तरफ़ संशय का वातावरण था, तब भी सिंघल जी ने अटूट विश्वास के साथ अयोध्या और आसपास की ज़मीन खरीदी, राजस्थान के कुसुमपुर से पत्थर मंगवाए और मंदिर निर्माण की कार्यशाला शुरू कराई। दशकों तक वह कार्यशाला कभी बंद नहीं हुई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह मंदिर किसी की कृपा, दया या राजनीतिक दबाव से नहीं बना। यह केवल और केवल हिंदू समाज के सामर्थ्य, संकल्प और पौरुष का परिणाम है। जिसने कोर्ट में केस लड़ा, उसने तप किया; जिसने पत्थर तराशा, उसने तप किया; जिसने चंदा दिया, उसने तप किया और जिसने गोली खाई, उसने सर्वोच्च तप किया।”

विश्व हिंदू परिषद के 61वें स्थापना दिवस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर आयोजित ध्वजारोहण समारोह में आलोक कुमार ने सभी हिंदुओं से आह्वान किया कि अब समय है स्वदेशी जीवन-मूल्यों को पुनः जीवंत करने का। उन्होंने कहा, “हमारे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट भले ही अंग्रेजी में काम करें, परंतु उनका चिंतन और अंतःकरण स्वदेशी होना चाहिए। हिंदू को हिंदू की तरह जीना चाहिए, अपने परिवार और समाज के साथ संस्कारों को बनाए रखना चाहिए और विश्व को सुख-शांति का मार्ग दिखाना चाहिए।” ध्वज के सामने उपस्थित सभी स्वयंसेवकों ने यह संकल्प दोहराया।

अंत में आलोक कुमार ने कहा कि कुछ अनुभूतियाँ शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है। राम मंदिर की पूर्णता के साथ जो संतोष, कृतज्ञता और नया निश्चय अंतःकरण में जागा है, वह अवर्णनीय है। यह केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं, बल्कि हिंदू समाज के आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। अगले तीन महीनों में बनने वाला कारसेवक स्मारक इस गौरव गाथा का जीवंत दस्तावेज बनेगा।

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