by-Ravindra Sikarwar
11 अक्टूबर को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाती है, जो लड़कियों के सपनों, आकांक्षाओं और अधिकारों को सशक्त करने का एक वैश्विक उत्सव है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2012 में शुरू किया गया यह दिन लड़कियों को शिक्षा, स्वास्थ्य, समानता और नेतृत्व के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता पर जोर देता है। 2025 की थीम, “लड़कियों की आवाज, हमारा भविष्य”, उनके सपनों को साकार करने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की उनकी क्षमता को रेखांकित करती है। भारत, जहां 23 करोड़ से अधिक लड़कियां हैं, इस दिन को न केवल उत्सव के रूप में, बल्कि सामाजिक सुधारों के लिए एक आह्वान के रूप में देखता है। यह लेख बालिका दिवस के महत्व, भारत में लड़कियों की स्थिति, चुनौतियों और प्रेरक कहानियों को विस्तार से प्रस्तुत करता है।
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस का महत्व: एक वैश्विक आंदोलन
संयुक्त राष्ट्र ने 2011 में 11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में घोषित किया, जिसका उद्देश्य लड़कियों के सामने आने वाली अनूठी चुनौतियों, जैसे बाल विवाह, लैंगिक भेदभाव, शिक्षा तक सीमित पहुंच और हिंसा, पर ध्यान देना था। यह दिन न केवल इन मुद्दों को उजागर करता है, बल्कि लड़कियों को सशक्त बनाने के लिए नीतिगत बदलाव और सामुदायिक कार्रवाइयों को प्रोत्साहित करता है। 2025 की थीम, “लड़कियों की आवाज, हमारा भविष्य”, इस बात पर बल देती है कि जब लड़कियों को अपनी बात रखने और नेतृत्व करने का मौका मिलता है, तो वे सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में 1.1 अरब लड़कियां हैं, जो वैश्विक आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें से कई लड़कियां गरीबी, युद्ध और सामाजिक रूढ़ियों से जूझ रही हैं। भारत में, जहां 23 करोड़ से अधिक लड़कियां (0-18 वर्ष) हैं, यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह देश के लिए एक अवसर है कि वह अपनी बेटियों को सशक्त बनाए और उन्हें भविष्य की नेता, वैज्ञानिक, शिक्षक और नवप्रवर्तक के रूप में तैयार करे।
भारत में लड़कियों की स्थिति: प्रगति और चुनौतियां
भारत ने पिछले कुछ दशकों में लड़कियों की स्थिति में सुधार के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, प्राथमिक शिक्षा में लड़कियों का नामांकन 98% तक पहुंच गया है, और माध्यमिक शिक्षा में 85% लड़कियां स्कूल जा रही हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी सरकारी योजनाओं ने लैंगिक समानता और वित्तीय स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया है। इसके बावजूद, कई चुनौतियां बरकरार हैं।
- बाल विवाह: यूनिसेफ की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 15-19 वर्ष की 27% लड़कियों की शादी हो जाती है, जो उनकी शिक्षा और करियर को प्रभावित करता है।
- शिक्षा में ड्रॉपआउट: ग्रामीण क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर पर 30% लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं, जिसके पीछे आर्थिक तंगी, असुरक्षा और सामाजिक दबाव प्रमुख कारण हैं।
- हिंसा और असुरक्षा: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2024 में लड़कियों के खिलाफ हिंसा के 1.2 लाख मामले दर्ज हुए, जिनमें यौन उत्पीड़न और अपहरण शामिल हैं।
- स्वास्थ्य और पोषण: किशोर लड़कियों में 40% से अधिक एनीमिया से पीड़ित हैं, जो उनकी शारीरिक और मानसिक वृद्धि को प्रभावित करता है।
इन चुनौतियों के बावजूद, भारत की लड़कियां हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रही हैं। 2025 में, 60% से अधिक स्टार्टअप्स में महिलाएं नेतृत्वकारी भूमिकाओं में हैं, और विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) क्षेत्रों में उनकी भागीदारी बढ़कर 35% हो गई है।
प्रेरक कहानियां: सपनों को सच करने वाली लड़कियां
भारत की कई लड़कियां ऐसी हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपने सपनों को साकार किया है। इनमें से कुछ प्रेरक कहानियां इस प्रकार हैं:
- रिया सिंगला, 17, पंजाब: रिया ने ग्रामीण पंजाब में एक सामाजिक उद्यम शुरू किया, जो लड़कियों को मुफ्त डिजिटल साक्षरता प्रशिक्षण देता है। उनकी पहल ‘डिजिटल बेटियां’ ने 10,000 लड़कियों को ऑनलाइन शिक्षा और नौकरी के अवसरों से जोड़ा है।
- आकृति वर्मा, 15, झारखंड: एक आदिवासी समुदाय से आने वाली आकृति ने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक ऐप विकसित किया, जो स्थानीय समुदायों को वृक्षारोपण और कचरा प्रबंधन में मदद करता है। उन्हें 2025 में यूनिसेफ यूथ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
- प्रिया मिश्रा, 19, उत्तर प्रदेश: प्रिया ने बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया और अपने गांव में 50 लड़कियों को स्कूल वापस लाने में मदद की। उनकी कहानी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई।
ये कहानियां दिखाती हैं कि जब लड़कियों को अवसर और समर्थन मिलता है, तो वे न केवल अपने जीवन को बदलती हैं, बल्कि समाज को भी नई दिशा देती हैं।
सरकार और समाज की भूमिका: सशक्तिकरण की राह
भारत सरकार ने लड़कियों के सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ने लैंगिक अनुपात में सुधार किया है, और 2025 में 943 लड़कियों प्रति 1000 लड़कों का अनुपात दर्ज किया गया। कन्या सुमंगला योजना और राष्ट्रीय बालिका शिक्षा अभियान ने लाखों लड़कियों को स्कूल पहुंचाया है। इसके अलावा, मिशन शक्ति जैसी पहलें हिंसा के खिलाफ सुरक्षा और आत्मरक्षा प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं।
समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गैर-सरकारी संगठन (NGOs) जैसे स्माइल फाउंडेशन और सेव द चिल्ड्रन लड़कियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और नेतृत्व कार्यक्रम चला रहे हैं। कॉर्पोरेट्स भी आगे आ रहे हैं; उदाहरण के लिए, टाटा स्टील ने 2025 में 10,000 लड़कियों को STEM स्कॉलरशिप दी।
चुनौतियों का समाधान: भविष्य के लिए कदम
लड़कियों के सामने आने वाली चुनौतियों को दूर करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं:
- शिक्षा तक पहुंच: ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की संख्या बढ़ाना और मुफ्त परिवहन की व्यवस्था करना।
- स्वास्थ्य और पोषण: किशोर लड़कियों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य जांच और पोषण किट प्रदान करना।
- कानूनी सुरक्षा: बाल विवाह और हिंसा के खिलाफ सख्त कानून लागू करना और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना।
- कौशल विकास: डिजिटल साक्षरता, कोडिंग और नेतृत्व जैसे कौशलों पर प्रशिक्षण देना।
- जागरूकता: सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए अभियान चलाना, जिसमें पुरुषों और समुदायों को शामिल किया जाए।
लड़कियों का सपना, देश का भविष्य:
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस हमें याद दिलाता है कि लड़कियां केवल भविष्य की आशा नहीं हैं, बल्कि वर्तमान की ताकत भी हैं। जब एक लड़की सपने देखती है, तो वह न केवल अपने लिए बल्कि अपने परिवार, समुदाय और देश के लिए बदलाव लाती है। भारत में लड़कियों को सशक्त बनाने का मतलब है 23 करोड़ आकांक्षाओं को पंख देना। यह समय है कि हम उनकी आवाज को सुनें, उनके सपनों को समर्थन दें और एक ऐसी दुनिया बनाएं जहां हर लड़की बिना डर और भेदभाव के आगे बढ़ सके। जैसा कि यूनिसेफ ने कहा, “जब एक लड़की सशक्त होती है, तो पूरी दुनिया सशक्त होती है।” आइए, इस बालिका दिवस पर यह संकल्प लें कि हर लड़की के सपने को हकीकत में बदलने के लिए हम मिलकर काम करेंगे।
