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BY: Ravindra Sikarwar

यह कहानी किसी साइबर थ्रिलर फिल्म की तरह शुरू नहीं होती—यह शुरू होती है हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से, उस ऐप से जिसे हम सुबह उठते ही खोलते हैं, जिससे हम परिवार, दोस्तों, दफ्तर और दुनिया से बात करते हैं। एक ऐसा ऐप जिस पर हम आँख मूँदकर भरोसा कर बैठते हैं—WhatsApp। लेकिन आज ये कहानी भरोसे के टूटने की है, एक ऐसी चूक की है जिसने धरती के लगभग हर इंसान को खतरे में डाल दिया है। 19 नवंबर 2025 की सुबह जब दुनिया जागी, तो एक खबर ने सबको हिला कर रख दिया—WhatsApp के 3.5 बिलियन, यानी 350 करोड़ मोबाइल नंबर लीक हो गए हैं। मतलब ऐप के लगभग हर यूजर का नंबर बाहर आ चुका है। और हैरानी की बात ये कि यह किसी हैकर का कारनामा नहीं था… बल्कि यह खामी Meta की लापरवाही से पैदा हुई थी—एक ऐसी लापरवाही, जिसे कंपनी पिछले आठ साल से नजरअंदाज कर रही थी। सोचिए—हम सभी का मोबाइल नंबर, हर देश के यूजर का डेटा, अरबों लोगों की प्राइवेसी—सब इस चूक की वजह से दांव पर लग गई। डिजिटल दुनिया में मोबाइल नंबर वह चाबी है जिससे आपकी पहचान, आपके अकाउंट्स, आपके OTP, आपका हर एक्सेस जुड़ा होता है। और आज यह चाबी दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी के हाथ से फिसलकर खुले इंटरनेट में गिर चुकी है। यह कहानी शुरू होती है 2017 से, जब University of Vienna के रिसर्चर्स ने एक बेहद मामूली सी तकनीकी खामी को नोट किया—खामी इतनी “simple” थी कि इसे देखकर साइबर एक्सपर्ट तक दंग रह गए। उन्होंने सिर्फ 30 मिनट के अंदर 3 करोड़ से ज्यादा अमेरिकी WhatsApp यूजर्स के नंबर निकाल लिए। सोचिए, आधा घंटा। अगर कोई हैकर इसे एक्सप्लॉइट करता, तो 30 मिनट में वह किसी शहर के नहीं, बल्कि पूरे देश के यूजर्स का डेटा निकाल सकता था। रिसर्चर्स ने यह डेटा तुरंत डिलीट कर दिया और Meta को सावधान भी किया। लेकिन वही Meta, जो ट्रिलियन-डॉलर की कंपनी है, जिसने WhatsApp को दुनिया के सबसे सुरक्षित मैसेजिंग ऐप होने का तमगा दिया है—वह इस चेतावनी को नींद में डालकर सो गई। साल दर साल निकलते गए… WhatsApp हर साल नए फीचर लाता रहा… Meta एड्स, रील्स, AI अपडेट्स में बिज़ी रहा… और वह खामी वहीं की वहीं पड़ी रही—बिलकुल एक टाइम बम की तरह। 2025 में यह टाइम बम फट गया। और जब फटा तो पता चला कि दुनिया के लगभग हर WhatsApp अकाउंट का नंबर लीक हो चुका है। इस बार रिसर्चर्स ने फिर Meta को अलर्ट किया—लेकिन Meta ने क्या किया? कुछ नहीं। आठ महीने तक वह चुप रहा—जैसे कुछ हुआ ही नहीं। शायद उन्हें लगा होगा कि बात दब जाएगी। लेकिन जब यह खबर मीडिया के हाथ लगी और इंटरनेट पर उफान उठ गया, तब Meta ने अपना क्लासिक PR मोड शुरू किया—“ये सब Bug Bounty Program का हिस्सा था।” यानी पूरी दुनिया को समझाने की कोशिश कि इतना विशाल डेटा लीक असल में “टेस्टिंग” का एक हिस्सा था। जबकि सच्चाई कुछ और थी—Meta सो रहा था, और उसकी नींद की कीमत हम सब चुकाने वाले थे। अब आते हैं उस खामी पर जिसने इतना बड़ा कांड कर दिया—खामी नंबर चेकिंग प्रोसेस में थी। आपको याद होगा—जब भी आप किसी का नंबर अपने फोन में सेव करते हैं, WhatsApp खुद बता देता है कि वह यूजर WhatsApp पर है या नहीं। यही सुविधा इस खामी की जड़ थी। नंबर को WhatsApp लुकअप API से चेक करके कोई भी स्क्रिप्ट पूरी दुनिया के नंबर सीक्वेंस में डाल सकती थी—और लाखों-करोड़ों नंबर निकाल सकती थी। यही रिसर्चर्स ने किया… और यही अब हैकर्स कर सकते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है—अगर यह खामी गलत हाथों में पड़ गई, तो यह मानव इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी डेटा लीकेज हो सकती है। अब सवाल उठता है—हम यूजर्स के लिए खतरा कितना बड़ा है? बहुत बड़ा। इतना बड़ा कि साइबर एक्सपर्ट्स इसे “ग्लोबल डिजिटल क्राइसिस” कह रहे हैं। क्योंकि मोबाइल नंबर लीक होना सिर्फ नंबर लीक होना नहीं होता—इसका मतलब है: ● OTP इंटरसेप्शन अटैक बढ़ सकते हैं ● SIM Swapping की घटनाएँ आसमान छू सकती हैं ● WhatsApp ब्लास्ट स्पैमिंग हो सकती है ● क्रिप्टो और बैंकिंग स्कैम बढ़ेंगे ● फिशिंग अटैक खतरनाक रूप से बढ़ेंगे ● आपकी पहचान ट्रैक करना आसान हो जाएगा ● आपका नंबर डार्क वेब पर बिक सकता है एक छोटी सी खामी की ये कीमत है। अब सवाल Meta पर खड़ा होता है—8 साल तक यह खामी क्यों नहीं सुधारी गई? Meta का जवाब—”हम इसे Bug Bounty Program के तहत ठीक कर रहे हैं और यह रिसर्चर्स के साथ Collaboration का परिणाम है।” लेकिन साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है—यह कोई सुधार नहीं, बल्कि आपदा है। Meta यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह खामी को “इन्नोसेंट” तरीके से हैंडल कर रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि उसने इसे नजरअंदाज किया और दुनिया का सबसे बड़ा प्राइवेसी संकट खड़ा कर दिया। WhatsApp दुनिया की सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग सर्विस है—हर महीने 3.5 बिलियन लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन एक खामी, जिसे 2017 में ही सुधारा जा सकता था, ने 2025 में दुनिया को डरा कर रख दिया। यह कहानी टेक्नोलॉजी की नहीं—यह कहानी लापरवाही की है। वह लापरवाही जो अरबों लोगों को जोखिम में डाल सकती है। WhatsApp सिर्फ एक ऐप नहीं, हमारे रोज़मर्रा का हिस्सा है—हमारी प्राइवेसी, हमारी पहचान, हमारी बातें, हमारी यादें—सब इसमें बंद हैं। लेकिन आज ये सवाल उठ रहा है—क्या हम सच में सुरक्षित हैं? या हम सिर्फ उस ऐप पर भरोसा कर रहे हैं जो पिछले आठ साल से एक खतरनाक बम को अपने सिस्टम में छिपाए बैठा था? यह घटना हमें याद दिलाती है—डिजिटल दुनिया में असली खतरा हैकर नहीं… असली खतरा वह कंपनी है जो अपनी गलतियों को छिपाती है। Meta की गलती ने दुनिया की प्राइवेसी में सेंध लगा दी है—और अब यह कहानी डिजिटल इतिहास में दर्ज हो चुकी है… उस सबसे बड़े डेटा लीक के रूप में जो पूरी तरह टाला जा सकता था… अगर Meta अपनी नींद से समय रहते जाग जाता। यह WhatsApp की सबसे डरावनी कहानी है—और उसकी सबसे शर्मनाक भी।

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