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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: हाल ही में लोकप्रिय क्विज शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) के एक एपिसोड में 10 वर्षीय प्रतियोगी ईशित भट्ट का आत्मविश्वासपूर्ण व्यवहार वायरल हो गया। होस्ट अमिताभ बच्चन के साथ उनकी बातचीत को कुछ दर्शकों ने ‘अनुचित’ या ‘अहंकारी’ करार दिया, जिससे सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई। इस बहस ने ‘सिक्स पॉकेट सिंड्रोम’ नामक एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा को सुर्खियों में ला दिया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कोई चिकित्सकीय रूप से मान्यता प्राप्त बीमारी नहीं है, बल्कि एक अनौपचारिक शब्द है जो छोटे परिवारों में अति-स्नेह और लाड़-प्यार के कारण बच्चों में विकसित होने वाली भावनात्मक और व्यवहारिक समस्याओं को दर्शाता है। आइए, इसकी पूरी जानकारी विस्तार से समझते हैं।

सिक्स पॉकेट सिंड्रोम की उत्पत्ति और अर्थ:
यह शब्द मूल रूप से चीन से आया है, जहां 1979 से 2015 तक चली एक-बच्चा नीति (वन चाइल्ड पॉलिसी) के कारण परिवारों में केवल एक बच्चा होता था। इस नीति के तहत, बच्चे को दो माता-पिता और चार दादा-दादी (कुल छह वयस्कों) का असीमित स्नेह, ध्यान और संसाधन मिलते थे। इन्हीं छह वयस्कों को प्रतीकात्मक रूप से ‘छह जेबें’ (सिक्स पॉकेट्स) कहा गया, क्योंकि प्रत्येक की ‘जेब’ से बच्चे को भौतिक, भावनात्मक और वित्तीय सहयोग मिलता रहता। समय के साथ, यह अवधारणा ‘लिटिल एम्परर सिंड्रोम’ (छोटे सम्राट सिंड्रोम) से जुड़ गई, जहां बच्चा परिवार का केंद्र बन जाता है, लेकिन सीमाओं के अभाव में वास्तविक दुनिया के लिए तैयार नहीं हो पाता।

भारत में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, खासकर शहरी न्यूक्लियर फैमिली सिस्टम के कारण। छोटे परिवार, बढ़ती आय, कामकाजी माता-पिता और दादा-दादी का अतिरिक्त लाड़-प्यार – ये सभी कारक बच्चे को ‘सब कुछ हक’ का भाव दिलाते हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. रिचा अनेजा के अनुसार, “यह सिंड्रोम अक्सर इकलौते बच्चों में देखा जाता है, जहां छह वयस्कों का संयुक्त स्नेह बच्चे को भावनात्मक रूप से कमजोर बना देता है।” यह कोई आनुवंशिक या जैविक समस्या नहीं, बल्कि परवरिश की शैली से उपजी है।

इसके कारण: क्यों होता है यह?
सिक्स पॉकेट सिंड्रोम के पीछे कई सामाजिक-आर्थिक कारक हैं:

  1. छोटे परिवार और इकलौते बच्चे: भारत में भी एक-दो बच्चे वाली नीति और शहरीकरण के कारण बच्चा परिवार का ‘राजकुमार’ बन जाता है। दादा-दादी रिटायरमेंट के बाद बच्चे पर अपना सारा प्यार उड़ेल देते हैं।
  2. अति-सुरक्षा और हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग: माता-पिता हर छोटी-बड़ी समस्या से बच्चे को बचाते हैं, जिससे वह असफलता या अस्वीकृति का सामना नहीं सीख पाता।
  3. भौतिक सुखों का अतिरेक: खिलौने, गैजेट्स, महंगे कपड़े और घूमने-फिरने का खर्च – ये सब ‘प्यार’ का प्रतीक बन जाते हैं, लेकिन जिम्मेदारी सिखाने की बजाय लाड़-प्यार बढ़ाते हैं।
  4. भावनात्मक संसाधनों की अधिकता: प्रशंसा, ध्यान और सहानुभूति का बाढ़ आना, लेकिन अनुशासन या ना कहना न के बराबर।
  5. सोशल मीडिया का प्रभाव: बच्चे को ‘परफेक्ट’ दिखाने की होड़ में माता-पिता सीमाएं तोड़ देते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या जनरेशन अल्फा (2010 के बाद जन्मे बच्चे) में अधिक दिख रही है, जहां डिजिटल दुनिया में भी तुरंत संतुष्टि की आदत पड़ जाती है।

लक्षण: बच्चे कैसे प्रभावित होते हैं?
यह सिंड्रोम बच्चों के व्यवहार, भावनाओं और सामाजिक कौशल को प्रभावित करता है। मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

लक्षणविवरण
हकदारी का भाव (Entitlement)बच्चा मानता है कि सब कुछ उसका हक है; मांग पूरी न होने पर गुस्सा या विद्रोह।
अधीरता और असहिष्णुताछोटी असफलता पर फ्रस्ट्रेशन, रोना या तुनकना; इंतजार करना या शेयरिंग न सीखना।
अधिक निर्भरताछोटे-छोटे कामों (जैसे जूते बांधना) के लिए भी वयस्कों पर आश्रित रहना।
भावनात्मक अस्थिरताअस्वीकृति या आलोचना सहन न कर पाना; सहानुभूति की कमी।
सामाजिक समस्याएंसाथियों से झगड़ा, अहंकार से भरा व्यवहार; KBC जैसे प्लेटफॉर्म पर ‘ओवरकॉन्फिडेंस’ दिखना।
दीर्घकालिक प्रभाववयस्क होने पर रिश्तों में तनाव, नौकरी में असफलता या मानसिक स्वास्थ्य मुद्दे।

KBC के ईशित मामले में, बच्चे का आत्मविश्वास कुछ लोगों को ‘अनादर’ लगा, लेकिन विशेषज्ञ इसे कैलिब्रेटेड कॉन्फिडेंस की कमी मानते हैं – जहां सकारात्मक ऊर्जा सही दिशा में न लगे।

प्रभाव: बच्चे, परिवार और समाज पर क्या असर?

  • बच्चे पर: भावनात्मक लचीलापन (रेजिलिएंस) की कमी से डिप्रेशन या एंग्जायटी का खतरा। वयस्क जीवन में असफलताओं से जूझना मुश्किल।
  • परिवार पर: माता-पिता को अपराधबोध या थकान; दादा-दादी का अतिरिक्त दखल परिवारिक कलह बढ़ा सकता है।
  • समाज पर: ऐसे बच्चे बड़े होकर ‘मैं-केंद्रित’ बनते हैं, जो टीमवर्क या सहयोगी संस्कृति को प्रभावित करते हैं। भारत जैसे सामूहिक समाज में यह समस्या और गंभीर है।

डॉ. टोन्मॉय शर्मा, मनोचिकित्सक, कहते हैं, “समस्या बच्चे में नहीं, बल्कि वयस्कों द्वारा बनाई गई दुनिया में है, जहां बच्चा हर बात का केंद्र होता है।”

रोकथाम और समाधान: कैसे सुधारें परवरिश?
विशेषज्ञों के सुझाव:

  1. सीमाएं तय करें: हर मांग पूरी न करें; ‘ना’ कहना सिखाएं। उदाहरण: खिलौना मांगने पर पहले घर का काम करवाएं।
  2. जिम्मेदारियां दें: उम्र के अनुसार छोटे टास्क (बर्तन धोना, बिस्तर समेटना) सौंपें, ताकि प्रयास का महत्व समझ आए।
  3. संतुलित स्नेह: प्यार दिखाएं, लेकिन पुरस्कार प्रयास से जोड़ें। प्रशंसा गुणवत्ता पर हो, न कि हर काम पर।
  4. स्वतंत्रता बढ़ाएं: बच्चे को छोटी असफलताओं (जैसे खेल हारना) से सीखने दें; हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग से बचें।
  5. परिवारिक चर्चा: दादा-दादी को शामिल कर एकसमान नियम बनाएं।
  6. पेशेवर मदद: यदि लक्षण गंभीर हों, तो मनोवैज्ञानिक से सलाह लें।

डॉ. राजीव मेहता, सीनियर साइकेट्रिस्ट, कहते हैं, “अति-स्नेह बच्चे को ‘मेम-वर्थी’ बनाता है, लेकिन वास्तविक दुनिया के लिए तैयार नहीं। संतुलन ही कुंजी है।”

KBC विवाद से सबक: क्या ईशित का व्यवहार इसका उदाहरण?
KBC 17 के एपिसोड में ईशित का अमिताभ बच्चन से ‘बहस’ वाला स्टाइल वायरल हुआ, जिसे कुछ ने ‘बुरी परवरिश’ कहा। लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं – आत्मविश्वास को अहंकार न समझें। बच्चन ने इसे ग्रेसफुली हैंडल किया, जो सकारात्मक उदाहरण है। यह घटना आधुनिक पेरेंटिंग पर आईना दिखाती है: स्नेह जरूरी है, लेकिन बिना अनुशासन के हानिकारक।

सिक्स पॉकेट सिंड्रोम कोई नई बीमारी नहीं, बल्कि परवरिश की चेतावनी है। माता-पिता सजग रहें, ताकि बच्चे आत्मविश्वासी लेकिन संवेदनशील बनें। अधिक जानकारी के लिए मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों से संपर्क करें।

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