भारत आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मना रहा है, जो प्रोफेसर सीवी रमन की अद्भुत खोज ‘रमन प्रभाव’ को समर्पित है। उनकी यह खोज विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाने के साथ-साथ अब अंतरिक्ष अनुसंधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
मंगल ग्रह की सतह पर शोध कर रहा नासा का पर्सिवरेंस रोवर रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक का उपयोग करके वहां की चट्टानों का विश्लेषण कर रहा है और प्राचीन सूक्ष्मजीवों के जीवन के प्रमाण खोजने की कोशिश कर रहा है।
क्या है रमन प्रभाव?
साल 1928 में भारतीय भौतिकविद् चंद्रशेखर वेंकटरमन (सीवी रमन) ने एक अद्भुत वैज्ञानिक सिद्धांत की खोज की, जिसे आज ‘रमन प्रभाव’ के नाम से जाना जाता है।
उन्होंने पाया कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ से गुजरता है, तो उसकी कुछ किरणें विभिन्न दिशाओं में बिखर जाती हैं, और इनमें से कुछ की वेवलेंथ (तरंगदैर्घ्य) में मामूली बदलाव आता है। यह बदलाव पदार्थ के अणुओं के कंपन (वाइब्रेशन) के कारण होता है, जिससे उसकी रासायनिक संरचना का पता लगाया जा सकता है।
इस खोज के लिए उन्हें 1930 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी इस खोज ने रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी को जन्म दिया, जो आज रसायन विज्ञान, चिकित्सा और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में बेहद उपयोगी तकनीक बन चुकी है।
मंगल ग्रह पर रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग
नासा का पर्सिवरेंस रोवर, जो फरवरी 2021 में मंगल ग्रह पर उतरा था, एक उन्नत उपकरण ‘SHERLOC’ (Scanning Habitable Environments with Raman & Luminescence for Organics and Chemicals) से लैस है। यह उपकरण गहरे अल्ट्रावायलेट लेजर का उपयोग करके मंगल ग्रह की चट्टानों और मिट्टी का विश्लेषण करता है।
SHERLOC रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की मदद से वहां मौजूद जैविक यौगिकों और खनिजों की पहचान करता है, जिससे वैज्ञानिक यह समझ सकते हैं कि क्या अतीत में मंगल पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियां मौजूद थीं।
भारतीय विज्ञान की वैश्विक पहचान
मंगल पर रमन प्रभाव का उपयोग यह दर्शाता है कि भारतीय वैज्ञानिक खोजों का प्रभाव कितना दूरगामी हो सकता है।
MIT-World Peace University के प्रो वाइस-चांसलर, डॉ. मिलिंद पांडे के अनुसार, “रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी बिना किसी विशेष नमूना तैयार किए किसी भी पदार्थ की संरचना की पहचान कर सकती है, जिससे यह मंगल ग्रह के कठोर वातावरण के लिए बेहद उपयुक्त साबित होती है। यह तकनीक जैव-हस्ताक्षरों (बायोसिग्नेचर्स) की पहचान करने में भी कारगर है, जिससे जीवन के संकेत मिल सकते हैं।”
क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं?
1928 में भारत में खोजा गया सिद्धांत आज लाखों किलोमीटर दूर मंगल ग्रह पर मानवता के सबसे बड़े सवाल—”क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं?”—का उत्तर खोजने में मदद कर रहा है।
सीवी रमन की यह खोज विज्ञान जगत के लिए एक अमूल्य योगदान है, जो पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक, ज्ञान और अनुसंधान की दिशा में नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है।
