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By: Ravindra Sikarwar

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर 25 दिसंबर 2025 को नाइजीरिया के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में इस्लामिक स्टेट (ISIS) से जुड़े आतंकवादी ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए गए। यह कार्रवाई नाइजीरिया सरकार के अनुरोध और सहयोग से की गई, जिसमें सोकोटो राज्य में कई ISIS कैंपों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी अफ्रीका कमांड (AFRICOM) ने पुष्टि की कि इन हमलों में कई आतंकवादी मारे गए। यह घटना वैश्विक आतंकवाद विरोधी अभियानों में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन ट्रंप के बयान ने इसे धार्मिक रंग दे दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई है।

हमलों की पृष्ठभूमि और विवरण
नाइजीरिया लंबे समय से बोको हराम और ISIS वेस्ट अफ्रीका प्रॉविंस (ISWAP) जैसे उग्रवादी समूहों की हिंसा से जूझ रहा है। उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी इलाकों में इन संगठनों की गतिविधियां बढ़ी हैं, जहां अपहरण, हत्याएं और हमले आम हो गए हैं। हाल के महीनों में ईसाई समुदायों पर हमलों की संख्या में वृद्धि हुई, जिसे ट्रंप ने “ईसाइयों का नरसंहार” करार दिया था।

अक्टूबर और नवंबर 2025 में ट्रंप ने नाइजीरिया सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर ईसाई समुदायों की रक्षा नहीं की गई तो अमेरिका हस्तक्षेप करेगा। इसके बाद अमेरिकी रक्षा विभाग ने तैयारी शुरू की। क्रिसमस की रात को किए गए इन हमलों में टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों और अन्य सटीक हथियारों का इस्तेमाल हुआ। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यह ऑपरेशन नाइजीरियाई सेना के साथ समन्वय में था और इसका उद्देश्य आतंकवादी नेटवर्क को कमजोर करना था। प्रारंभिक आकलन में कई ISIS लड़ाकों के मारे जाने की बात कही गई है, हालांकि नागरिक हताहतों की कोई जानकारी नहीं दी गई।

ट्रंप का बयान और उठा विवाद
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर हमलों की घोषणा की। उन्होंने लिखा कि उनके निर्देश पर अमेरिका ने “उत्तर-पश्चिमी नाइजीरिया में ISIS के आतंकी तत्वों के खिलाफ शक्तिशाली और घातक हमला किया, जो मुख्य रूप से निर्दोष ईसाइयों को निशाना बना रहे थे”। ट्रंप ने इसे “सदियों में नहीं देखे गए स्तर” की हिंसा बताया और चेतावनी दी कि अगर यह जारी रहा तो और हमले होंगे।

सबसे विवादास्पद हिस्सा उनका यह बयान था: “ईश्वर हमारी सेना को आशीर्वाद दे, और सभी को क्रिसमस की शुभकामनाएं, जिसमें मारे गए आतंकवादी भी शामिल हैं – अगर ईसाइयों का कत्ल जारी रहा तो ऐसे और कई होंगे।” इस टिप्पणी को कुछ लोग मजबूत नेतृत्व का प्रतीक मान रहे हैं, जबकि आलोचक इसे धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला बता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नाइजीरिया में हिंसा जटिल है – इसमें धार्मिक के अलावा जातीय, आर्थिक और भूमि विवाद भी शामिल हैं, और ज्यादातर शिकार मुस्लिम ही होते हैं।

रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने भी सोशल मीडिया पर कहा कि “युद्ध विभाग हमेशा तैयार है, इसलिए ISIS को आज क्रिसमस पर पता चला” और नाइजीरियाई सरकार के सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

नाइजीरिया सरकार का रुख
नाइजीरियाई विदेश मंत्रालय ने हमलों की पुष्टि की और इसे दोनों देशों के बीच लंबे सुरक्षा सहयोग का हिस्सा बताया। मंत्रालय ने कहा कि यह कार्रवाई “आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले” थे, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता के सम्मान के साथ की गई। सरकार ने जोर दिया कि वह सभी नागरिकों – चाहे किसी भी धर्म या जाति के हों – की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।

राष्ट्रपति बोला अहमद टिनूबू ने क्रिसमस संदेश में धार्मिक स्वतंत्रता और शांति की बात की, साथ ही सभी नागरिकों की रक्षा का वादा किया। नाइजीरिया ने ट्रंप के ईसाई उत्पीड़न के आरोपों को खारिज किया है, कहते हुए कि हिंसा सभी समुदायों को प्रभावित करती है।

वैश्विक प्रतिक्रियाएं और भविष्य की चुनौतियां
यह कार्रवाई ट्रंप प्रशासन की आक्रामक विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें हाल ही में सीरिया, यमन और अन्य जगहों पर भी हमले हुए हैं। समर्थक इसे आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम मानते हैं, जबकि आलोचक चिंता जताते हैं कि धार्मिक आधार पर सैन्य हस्तक्षेप क्षेत्रीय तनाव बढ़ा सकता है।

नाइजीरिया में अस्थिरता जारी है – लाखों लोग विस्थापित हैं, और आतंकवादी समूहों की फंडिंग व लॉजिस्टिक्स अभी भी मजबूत हैं। दोनों देशों का सहयोग खुफिया जानकारी साझा करने, सीमा सुरक्षा और आतंकवादी वित्त पोषण रोकने पर केंद्रित है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य कार्रवाई पर्याप्त नहीं; सामाजिक-आर्थिक विकास और अंतर-समुदाय संवाद भी जरूरी है।

यह घटना वैश्विक सुरक्षा नीतियों में धार्मिक आयाम जोड़ने की बहस को नया आयाम दे रही है। क्या आतंकवाद का मुकाबला सिर्फ सुरक्षा के नजरिए से होना चाहिए, या धार्मिक संदर्भ शामिल करना उचित है? आने वाले दिनों में इस पर और चर्चा होने की संभावना है।

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