US-Iran Peace AgreementUS-Iran Peace Agreement
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US-Iran Peace Agreement : मध्य पूर्व में पिछले 108 दिनों से जारी भीषण संघर्ष और तनाव के बाद आखिरकार एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी मिलती दिख रही है। अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी युद्धविराम को लेकर सहमति बन गई है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद दुनिया भर के बाजारों और तेल आपूर्ति पर लगी पाबंदियां हटने का रास्ता साफ हो गया है। आगामी 19 जून (शुक्रवार) को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधि इस महा-शांति समझौते (Peace Deal) पर हस्ताक्षर करेंगे।

हालांकि, यह समझौता इतना आसान नहीं था। ईरान ने बातचीत की मेज पर अमेरिका के सामने 14 ऐसी सख्त शर्तें रखी हैं, जिन्हें माने बिना वह इस डील को आगे बढ़ाने को तैयार नहीं था। ईरानी मीडिया के अनुसार, ट्रंप प्रशासन इन शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर हुआ है। आइए जानते हैं क्या हैं वो 14 शर्तें और क्या है इस डील का पूरा समीकरण।

US-Iran Peace Agreement ईरान की वो 14 शर्तें जिन्होंने बदली पूरी बाजी

ईरानी मीडिया के मुताबिक, मुख्य बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान ने अपनी कुछ शर्तों पर तुरंत अमल करने की मांग की है, जिसमें फ्रीज किए गए फंड को जारी करना और आर्थिक नाकेबंदी हटाना शामिल है। सभी 14 शर्तें इस प्रकार हैं:

  • तेल और निर्यात पर छूट: ईरान के कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल्स और उससे संबंधित सभी एक्सपोर्ट पर लगीं अमेरिकी पाबंदियां तुरंत हटाई जाएं।
  • वित्तीय संसाधनों पर नियंत्रण: ईरान को उसके सभी वैश्विक वित्तीय संसाधनों का पूरा एक्सेस वापस दिया जाए।
  • फ्रीज फंड की बहाली: अगले 60 दिनों की वार्ता के दौरान ईरान की ब्लॉक की गई 24 अरब डॉलर की राशि को अनलॉक किया जाए। इसमें से 12 अरब डॉलर की पहली किस्त बातचीत शुरू होने से ठीक पहले जारी होनी चाहिए।
  • पुनर्निर्माण पैकेज: अमेरिका और उसके मित्र देशों को ईरान के बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स की रूपरेखा पेश करनी होगी।
  • पूर्ण युद्धविराम: लेबनान सहित सभी सक्रिय मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों को तत्काल और हमेशा के लिए रोका जाए।
  • संप्रभुता का सम्मान: वाशिंगटन यह लिखित आश्वासन देगा कि वह ईरान के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा और उसकी संप्रभुता का सम्मान करेगा।
  • नौसैनिक घेराबंदी का खात्मा: अमेरिका द्वारा लगाई गई समुद्री नाकेबंदी को 30 दिनों के भीतर पूरी तरह समाप्त किया जाए।
  • सेना की वापसी: ईरानी सीमाओं और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों से अमेरिकी सेनाएं पीछे हटेंगी।
  • हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को ईरान की व्यवस्था के तहत 30 दिनों के भीतर दोबारा यातायात के लिए खोला जाएगा।
  • 60 दिनों की समयसीमा: परमाणु मुद्दों और प्रतिबंधों को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए 60 दिनों की आधिकारिक वार्ता अवधि तय होगी।
  • NPT पर प्रतिबद्धता: ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत परमाणु हथियार न बनाने के अपने पुराने संकल्प को दोहराएगा।
  • अतिरिक्त पाबंदियों पर रोक: बातचीत के इस दौर के दौरान अमेरिका न तो क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाएगा और न ही ईरान पर कोई नया प्रतिबंध लगाएगा।
  • UNSC की निगरानी: समझौते की शर्तों के पालन के लिए एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र बनेगा और अंतिम डील को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्ताव के जरिए कानूनी मंजूरी दी जाएगी।
  • मिसाइल और रेजिस्टेंस ग्रुप पर नो-टॉक: ईरान के मिसाइल प्रोग्राम और क्षेत्रीय ‘रेजिस्टेंस ग्रुप्स’ (प्रतिरोध गुटों) को मिलने वाले समर्थन के मुद्दे पर कोई बातचीत या समझौता नहीं होगा।

US-Iran Peace Agreement तेल संकट और आर्थिक नाकेबंदी से राहत की उम्मीद

इस समझौते का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ने वाला है। पिछले काफी समय से ईरान पर लगी सख्त आर्थिक और तेल पाबंदियों की वजह से वैश्विक तेल सप्लाई चेन प्रभावित थी। ईरान की शर्तों के मुताबिक, अगर अमेरिका 12 अरब डॉलर की शुरुआती रकम जारी करने और तेल प्रतिबंधों को हटाने में ढील देता है, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी राहत देखने को मिल सकती है। हालांकि, ईरान ने साफ कर दिया है कि अगर तय समयसीमा के भीतर इन शर्तों को अमलीजामा नहीं पहनाया गया, तो यह पीस डील किसी भी वक्त रद्द हो सकती है, जिससे दोनों देशों के बीच फिर से युद्ध के बादल मंडराने लगेंगे।

US-Iran Peace Agreement क्या नेतन्याहू बनेंगे इस पीस डील में रोड़ा?

इस पूरे समझौते के बीच सबसे बड़ा सस्पेंस इजरायल के रुख को लेकर बना हुआ है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस डील को स्वीकार करेंगे? ईरान की शर्तों में लेबनान मोर्चे पर तुरंत युद्ध रोकने की बात कही गई है, जबकि महज 24 घंटे पहले ही इजरायली वायुसेना ने बेरूत पर भीषण बमबारी की है।

ऐसे में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सबसे करीबी सहयोगी इजरायल को मनाने की होगी। क्या इजरायली सेना लेबनान से पीछे हटने को तैयार होगी? यदि इजरायल इस समझौते के खिलाफ जाकर अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखता है, तो जिनेवा में होने वाली इस ऐतिहासिक पीस डील के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं।

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