By: Ravindra Sikarwar
देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक संतुलन को मजबूत करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान और उनके दस्तावेजों के सत्यापन को नई गति दे रही हैं। उत्तर प्रदेश, जो जनसंख्या, भौगोलिक फैलाव और रणनीतिक दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है, इस अभियान में विशेष रूप से सक्रिय भूमिका निभा रहा है। प्रदेश सरकार ने सभी डीएम, एसएसपी व अन्य पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि विदेशी नागरिकों के दस्तावेजों की विस्तृत जांच की जाए और ऐसे लोगों की पहचान को प्राथमिकता दी जाए, जो बिना अनुमति के राज्य में रह रहे हैं। यूपी की विशेष भौगोलिक स्थिति—जिसमें आठ राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश और नेपाल की खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा का विस्तार शामिल है—इस सत्यापन अभियान को और चुनौतीपूर्ण बनाती है। पिछले कुछ वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्रों में अस्थिरता, फर्जी पहचान आधारित गतिविधियों और घुसपैठ के मामलों में जिस तरह वृद्धि दर्ज हुई है, उसने राज्य की सुरक्षा एजेंसियों को अधिक सक्रिय होने के लिए बाध्य किया है।
अवैध घुसपैठ की वजह से न केवल कानून-व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, बल्कि सामाजिक सामंजस्य और संसाधनों के वितरण पर भी असर पड़ता है। कई विदेशी नागरिक फर्जी पहचान पत्र, गलत पते और बदले हुए नामों के जरिए बड़े शहरों में मजदूरी से लेकर अन्य गतिविधियों तक में शामिल पाए जा रहे हैं। इससे न केवल अपराध का जोखिम बढ़ता है, बल्कि स्थानीय जनसंख्या के रोजगार और सरकारी योजनाओं पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में उत्तर प्रदेश पुलिस और जिला प्रशासन संयुक्त रूप से व्यापक सत्यापन अभियान चला रहे हैं। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को परेशान न किया जाए, लेकिन यदि कोई व्यक्ति संदिग्ध पाया जाता है या फर्जी दस्तावेजों का उपयोग करता है, तो उसके विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस प्रक्रिया में आधुनिक तकनीक, डेटा-आधारित विश्लेषण और स्थानीय खुफिया जानकारी का उपयोग भी किया जा रहा है ताकि जांच अधिक सटीक और पारदर्शी हो सके।
प्रदेश सरकार अवैध रूप से रह रहे व्यक्तियों की पहचान के बाद उन्हें अस्थायी रूप से रखने के लिए सभी जिलों में डिटेंशन सेंटर स्थापित कर रही है। यह व्यवस्था इसलिए की जा रही है ताकि दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान ऐसे व्यक्तियों को सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण में रखा जा सके। प्रशासन का मानना है कि इससे जांच तेज होगी और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के गायब होने की संभावना कम हो जाएगी। डिटेंशन सेंटर न केवल कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाएंगे, बल्कि इससे स्थानीय पुलिस थानों और जेलों पर अनावश्यक बोझ भी नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन केंद्रों में रहने वाले व्यक्तियों के मानवाधिकारों और बुनियादी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाएगा, ताकि प्रक्रिया मानवीय और न्यायपूर्ण बनी रहे।
अवैध विदेशी नागरिकों की संख्या को लेकर केंद्र सरकार द्वारा पहले भी कई बार चिंता जताई जा चुकी है। वर्ष 2016 में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद में बताया था कि भारत में अनुमानित 2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी रह रहे हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, अगस्त 2017 में संसद को यह भी सूचित किया गया कि देश में अवैध रूप से निवास कर रहे रोहिंग्या नागरिकों की संख्या 40 हजार से अधिक हो सकती है। इन आंकड़ों ने न केवल सुरक्षा एजेंसियों को सक्रिय किया, बल्कि राज्य सरकारों को भी व्यापक रणनीति बनाने के लिए प्रेरित किया। उत्तर प्रदेश में चल रहा यह अभियान इसी बड़े राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है, जिसमें अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान, दस्तावेजों की जांच, आवश्यक होने पर हिरासत और बाद में कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप आगे की कार्रवाई शामिल है।
इस व्यापक सत्यापन अभियान से सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है—प्रदेश में रह रहे प्रत्येक विदेशी नागरिक की पहचान सुनिश्चित की जाए, अवैध प्रवास पर रोक लगे और सुरक्षा व संसाधनों पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव समाप्त हो। आने वाले महीनों में यह अभियान और तेज गति से आगे बढ़ेगा, और सरकार उम्मीद कर रही है कि इससे प्रदेश की सुरक्षा प्रणाली अधिक मजबूत होगी और सामाजिक सामंजस्य भी सुदृढ़ होगा।
