by-Ravindra Sikarwar
यूक्रेन संघर्ष के बीच, भारत की तटस्थ भूमिका और रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका और भारत के अधिकारियों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं।
अमेरिकी अधिकारी पीटर नवारो की विवादास्पद टिप्पणी:
अमेरिका के पूर्व व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत की स्थिति को लेकर एक विवादास्पद बयान दिया है। उन्होंने भारत के रूस से तेल खरीदने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह एक “विशाल भू-राजनीतिक गलती” है। नवारो का तर्क है कि इस तरह के व्यापार से रूस को आर्थिक रूप से लाभ होता है, जिससे वह यूक्रेन के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को जारी रख पाता है। उनकी टिप्पणियों ने अमेरिका और भारत के संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर दिया है।
भारत का अपनी ऊर्जा जरूरतों का बचाव:
इसके जवाब में, भारतीय अधिकारियों ने अपने देश की ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता का दृढ़ता से बचाव किया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि भारत अपनी राष्ट्रीय जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी देश से तेल खरीदने का अधिकार रखता है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित अन्य अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि भारत का प्राथमिक कर्तव्य अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है, और यह काम वह सबसे किफायती तरीके से करेगा।
भारतीय पक्ष का कहना है कि:
- राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: भारत की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना भारत के आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
- दोगलापन: भारतीय अधिकारियों ने पश्चिमी देशों पर भी निशाना साधा है, जो खुद रूस से गैस और तेल खरीद रहे हैं, लेकिन भारत को ऐसा करने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
- अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन: भारत ने किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं किया है और वह संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के सिद्धांतों का पालन करता है।
यह विवाद दर्शाता है कि वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती हुई आत्मनिर्भर और स्वतंत्र विदेश नीति कुछ देशों को असहज कर रही है, जबकि भारत अपने हितों की रक्षा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
