Spread the love

Writer: Yoganand Shrivastava

आज बात करेंगे उस ‘यूजीसी रेगुलेशंस 2026’ की, जिसने बिहार की गलियों से लेकर दिल्ली के गलियारों तक एक नया सियासी और सामाजिक भूचाल ला दिया है। कहानी शुरू होती है 15 जनवरी 2026 को, जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने एक नया फरमान जारी किया, जिसे नाम दिया गया ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’। कहने को तो यह नियम उच्च शिक्षा में जातिवाद और भेदभाव को खत्म करने की एक ‘पवित्र’ कोशिश है, लेकिन इसके पन्नों को जैसे ही पलटा गया, सवर्ण समाज और शिक्षाविदों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गईं। इस बिल का सबसे विवादित हिस्सा वो है, जहाँ 2012 के पुराने प्रावधानों को कूड़ेदान में फेंक दिया गया है। 2012 के नियमों में एक सुरक्षा कवच था—अगर कोई व्यक्ति किसी शिक्षक या छात्र पर जातिगत भेदभाव की झूठी शिकायत करता था, तो उस पर कार्रवाई होती थी, लेकिन 2026 के नए नियम में इस दंड के प्रावधान को ही हटा दिया गया है। अब विरोध करने वालों का सीधा तर्क ये है कि भाई, जब झूठ बोलने पर कोई सजा ही नहीं होगी, तो फिर किसी भी सवर्ण प्रोफेसर या छात्र को निपटाना कितना आसान हो जाएगा? बिहार में तो हालत ये है कि इसे ‘दूसरा SC-ST एक्ट’ करार दिया जा रहा है। हाजीपुर से लेकर पटना तक लोग सड़कों पर हैं और बीजेपी के झंडे तक जलाए जा रहे हैं क्योंकि लोगों को लगता है कि उनकी अपनी सरकार ने उन्हें बिना ढाल के युद्ध के मैदान में छोड़ दिया है। उधर, शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी ने भी इस पर तीखे सवाल दागे हैं कि आखिर कानून सबको सुरक्षा देने वाला क्यों नहीं है? अगर भेदभाव की परिभाषा सिर्फ ‘सोच’ और ‘शब्दों’ तक सीमित रही, तो इसे तय कौन करेगा? क्या अब यूनिवर्सिटी के कैंपस पढ़ाई के बजाय मुकदमों और शिकायतों के अखाड़े बनेंगे? यूजीसी का कहना है कि 2019 से 2023 के बीच भेदभाव की शिकायतों में 118% का उछाल आया है, इसलिए सख्ती जरूरी है, लेकिन आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या इस सख्ती की कीमत शैक्षणिक माहौल की बर्बादी होगी? नए नियमों के तहत अगर कोई संस्थान इन शर्तों को नहीं मानता, तो उसकी फंडिंग रोक दी जाएगी और भारी जुर्माना लगाया जाएगा। यानी अब यूनिवर्सिटी की आजादी पर सरकार का सीधा पहरा होगा। शिक्षकों के बीच डर का माहौल है कि नियुक्तियों और प्रमोशन में इस नियम का इस्तेमाल ‘हथियार’ की तरह होगा ताकि योग्यता को दरकिनार कर खास एजेंडे को थोपा जा सके। सवर्ण संगठनों का कहना है कि यह बिल समानता लाने के नाम पर समाज में एक नई और गहरी खाई खोद रहा है, जहाँ एक पक्ष के पास असीमित अधिकार हैं और दूसरे के पास बचाव का कोई रास्ता नहीं। कुल मिलाकर, यूजीसी का यह दांव सरकार के लिए गले की हड्डी बन गया है, जहाँ एक तरफ सुधार का ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ ‘कोटे वाले झूठी शिकायत करके बच जाएंगे’ वाला डर सवर्ण समाज को पूरी तरह बागी बना चुका है। अगर जल्द ही इसमें संशोधन नहीं हुआ, तो 2026 का यह बिल कैंपस की शांति को हमेशा के लिए स्वाहा कर सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *