UGC: यूजीसी विनियम पर एक पुनर्विचार, नीति की मंशा और प्रस्तुति
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रस्तावित उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन संबंधी विनियमों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। समता, समावेशन और सामाजिक न्याय जैसे मूल्य सुनने में निस्संदेह आकर्षक हैं। परंतु किसी भी नीति का वास्तविक मूल्यांकन उसके घोषित उद्देश्यों से नहीं, बल्कि उसकी संरचना और व्यावहारिक प्रभावों से होता है।
UGC: पहचान-आधारित ढांचे की दुविधा
इस विनियम की संपूर्ण संरचना धर्म, जाति, लिंग, नस्ल, जन्म-स्थान और दिव्यांगता जैसी पहचान-आधारित श्रेणियों पर टिकी हुई दिखाई देती है। अनिवार्य समितियाँ, निगरानी इकाइयाँ और प्रतिनिधित्व की व्यवस्थाएँ व्यक्ति को एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में नहीं, बल्कि पहले किसी सामाजिक वर्ग के सदस्य के रूप में देखती हैं। इससे समान नागरिकता की अवधारणा कमजोर पड़ती प्रतीत होती है और पहचान-आधारित राजनीति को संस्थागत रूप मिलने की आशंका बढ़ जाती है।
UGC: भेदभाव की अस्पष्ट परिभाषा
विनियम में भेदभाव की परिभाषा इतनी व्यापक है कि उसकी सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। प्रत्यक्ष व्यवहार के साथ-साथ भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक या कथित असुविधाओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। न्याय की बुनियादी शर्त स्पष्टता होती है, किंतु यहां अनिश्चितता ही व्यवस्था का स्थायी अंग बनती दिखती है, जिससे भय और आत्म-नियंत्रण का वातावरण बन सकता है।
संवाद बनाम शिकायत संस्कृति
उच्च शिक्षा संस्थानों का मूल उद्देश्य मुक्त संवाद, वैचारिक असहमति और आलोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करना रहा है। किंतु इस विनियम के तहत स्थापित होने वाली हेल्पलाइन, निगरानी तंत्र और नियमित रिपोर्टिंग प्रणाली विश्वास की जगह अविश्वास को बढ़ावा देती प्रतीत होती है। शिक्षक, विद्यार्थी और कर्मचारी एक-दूसरे को सहयात्री के बजाय संभावित शिकायतकर्ता या आरोपी के रूप में देखने लगें—यह स्थिति सामाजिक समरसता के लिए घातक हो सकती है।
स्वायत्तता और दंडात्मक प्रवृत्ति
विनियम में यूजीसी को दंडात्मक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिनके माध्यम से संस्थानों की मान्यता, कार्यक्रमों और वित्तीय सहायता पर रोक लगाई जा सकती है। यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निहित संस्थागत स्वायत्तता की भावना के विपरीत प्रतीत होती है और विश्वविद्यालयों को ज्ञान-सृजन के केंद्र के बजाय नियंत्रण-प्रणाली का अंग बना देती है।
समता का वैकल्पिक मार्ग
समानता का वास्तविक आधार पहचान नहीं, बल्कि संवाद, समान अवसर और शैक्षणिक स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि समता को प्रबंधकीय निगरानी और समूह-चेतना तक सीमित कर दिया गया, तो वह विभाजन को समाप्त करने के बजाय स्थायी बना सकती है।
आवश्यकता इस बात की है कि समता को पहचान-आधारित संरचनाओं से मुक्त कर, साझा नागरिकता और बौद्धिक स्वतंत्रता के व्यापक दृष्टिकोण से पुनः परिभाषित किया जाए—अन्यथा समावेशन के नाम पर विखंडन का जोखिम बना रहेगा।
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