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by-Ravindra Sikarwar

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय आयात पर शुल्क में महत्वपूर्ण वृद्धि की घोषणा की है, इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। यह कदम संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक को निशाना बनाता है और रूस से भारत की लगातार तेल खरीद के जवाब में उठाया गया है।

भारत से आने वाले सामानों पर पहले से ही 25 प्रतिशत शुल्क लगने वाला था। हालांकि, एक कार्यकारी आदेश के अनुसार, अगले तीन हफ्तों में अतिरिक्त 25 प्रतिशत कर लगाया जाएगा। इस आदेश में भारत पर “प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूसी संघ का तेल आयात करने” का आरोप लगाया गया है और इसे यूक्रेन में रूस की सैन्य कार्रवाइयों के जवाब के रूप में बताया गया है।

टैरिफ का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव:
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि टैरिफ का भुगतान निर्यातक देश द्वारा नहीं, बल्कि अमेरिकी व्यवसायों और उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है, जिससे लागत में वृद्धि होती है। इस वृद्धि के जवाब में, ऐप्पल जैसी कंपनियों ने प्रभावित देशों से उत्पादन को दूर करने के लिए अमेरिका में नई विनिर्माण सुविधाओं में 100 बिलियन डॉलर का निवेश करने की योजना की घोषणा की है। ट्रंप ने उन कंपनियों को टैरिफ में छूट देने का भी संकेत दिया है जो अमेरिका में नई उत्पादन सुविधाएं स्थापित करती हैं।

दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, रणधीर जायसवाल ने अमेरिका की कार्रवाइयों को “अन्यायपूर्ण, अनुचित और अतार्किक” बताया। उन्होंने तर्क दिया कि भारत की रूस से तेल खरीद “बाजार कारकों” पर आधारित थी और यह भारत के राष्ट्रीय हित में है।

भारत के लिए एक मुश्किल स्थिति:
यह स्थिति भारत के लिए एक मुश्किल कूटनीतिक और आर्थिक चुनौती खड़ी करती है। भारत, अमेरिका का 12वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन रूस के साथ भी उसका मजबूत आर्थिक और रणनीतिक गठबंधन है। भारत ब्रिक्स राष्ट्रों के गुट का सदस्य है और 2023 से रूसी कच्चे तेल का शीर्ष खरीदार रहा है। इसके अलावा, वह अपनी सैन्य रक्षा प्रणालियों के लिए भी रूस पर काफी हद तक निर्भर है।

ये टैरिफ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक राजनीतिक चुनौती बन गए हैं। विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने मोदी की विदेश नीति की आलोचना करते हुए कहा है कि ट्रंप के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध भारत को आर्थिक रूप से लाभप्रद स्थिति में नहीं ला पाए हैं। येल विश्वविद्यालय के एक विशेषज्ञ, सुशांत सिंह ने कहा कि यह स्थिति भारत को, और विशेष रूप से मोदी को व्यक्तिगत रूप से “शर्मनाक” स्थिति में डालती है।

भारत ने टैरिफ को “अन्यायपूर्ण” बताया:
भारत ने इन शुल्कों का कड़ा विरोध किया है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, रणधीर जायसवाल ने अमेरिका की कार्रवाइयों को “अन्यायपूर्ण, अनुचित और अतार्किक” बताया है। उन्होंने कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। भारत का तर्क है कि रूस से उसकी तेल खरीद “बाजार कारकों” पर आधारित है और यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

इस मुद्दे पर भारत की संसद में भी तीखी बहस हुई है। विपक्षी दलों ने सरकार से इस पर तुरंत प्रतिक्रिया देने और अमेरिका पर दबाव बनाने की मांग की है।

टैरिफ का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव:
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि टैरिफ का भुगतान निर्यातक देश द्वारा नहीं, बल्कि अमेरिकी व्यवसायों और उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है। इससे अमेरिका में भारतीय सामानों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ पड़ेगा।

इस स्थिति ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक राजनीतिक चुनौती भी खड़ी कर दी है। विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने मोदी की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि ट्रंप के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध भारत को आर्थिक रूप से लाभप्रद स्थिति में नहीं ला पाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत के लिए एक बहुत ही कठिन परिस्थिति है, क्योंकि उसे रूस के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को अमेरिका के साथ अपने नए संबंधों के साथ संतुलित करना पड़ रहा है।

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