By: Ravindra Sikarwar
8 दिसंबर 2025 को संसद के शीतकालीन सत्र में 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् पर विशेष बहस आयोजित की गई, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वाधीनता संघर्ष की “मानसिकता, संकल्प और देशभक्ति का प्रतीक” है।
वंदे मातरम् — आज 150 वर्ष
- वंदे मातरम् का रचनाकाल 19वीं शताब्दी के अंत में रहा। यह गीत पहली बार 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुआ था।
- इस सितंबर सत्र के समापन से पहले, 7 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय समारोह में पूरे देश में वर्ष-भर मनाए जाने वाले 150-वर्ष समारोह का शुभारंभ किया था। इस दौरान स्मारक टिकट और सिक्का जारी किया गया।
मोदी ने लोकसभा में कहा कि आज “वंदे मातरम्” के 150 साल पूरे होने का साक्षी बनना हमारे लिए गर्व की बात है।
वंदे मातरम् — ब्रिटिश राज के विरुद्ध एक मशाल
प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि जब वंदे मातरम् की रचना हुई थी, उस समय ब्रिटिश शासन भारत में अपना संगीत और ब्रीटिश संस्कृति घर-घर पहुंचाना चाहता था।
लेकिन वंदे मातरम् एक ऐसी आवाज़ बना जो देश के लोगों को एक साथ जोड़ रही थी। मोदी ने कहा कि यह गीत उस दौर में एक क्रांति-कथा बन गया, जिसने लोगों में आज़ादी की उम्मीद जगाई।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् ने अंग्रेजों की “विभाजन और राज” की नीति का मुकाबला किया — विशेष रूप से 1905 में बंगाल विभाजन के समय, जब ब्रिटिश “Divide and Rule” की रणनीति अपना रहे थे।
मोदी ने कहा, “वंदे मातरम् सिर्फ गीत नहीं, वह लड़ने की शक्ति है — देश का मनोबल है, जिसने आज़ादी की राह दिखाई।”
पिछली गलतियों की ओर इशारा
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि जब वंदे मातरम् 100 साल का हुआ था, उस समय देश पर आपातकाल लागू था — सामाजिक, संवैधानिक और राजनीतिक छोड़ियाँ बंद थीं।
उन्होंने यह सवाल उठाया कि अगर वंदे मातरम् का महत्व सही मायने में समझा गया होता, तो तब देश उस इतिहास-काली अवधि में नहीं फँसता। अब 150 साल की इस वर्षगांठ पर, हमें उसके गौरव को पुनर्स्थापित करना चाहिए।
वंदे मातरम् — देशभक्ति और एकता का सूत्र
मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् ने सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम के समय नहीं, बल्कि आज भी उस भाव को बनाए रखा है — जो हमें देश की एकता, विविधता में एकरूपता और राष्ट्रीय गौरव की ओर ले जाता है।
उन्होंने यह विश्वास जताया कि किसी भी मतभेद या विवाद के बीच भी यह गीत हमें याद दिलाता है कि हम एक राष्ट्र हैं, एक भारतीय हैं।
लेकिन बहस और विवाद भी रहा हिस्सा
लोकसभा में इस अवसर पर कांग्रेस और अन्य दलों के साथ इस गीत के इतिहास, उसके कुछ श्लोकों के कमीशन, धार्मिक असहमति और विभाजन-काल के दौरान उसके उपयोग को लेकर बहस रही। मोदी ने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि 1937 में इस गीत के कुछ पंक्तियाँ हटाई गई थीं, जिसने देश के विभाजन की नींव रखी।
यही वजह है कि वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक आत्मा पर पुनर्विचार का मौका भी बन गई है।
सार — वंदे मातरम् का वर्तमान में महत्व
इस लोकसभा बहस से एक बात स्पष्ट हुई — वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, एक धरोहर है, एक आदर्श है, जो देश को जोड़े रखता है। 150 वर्ष बाद भी, उसकी चेतना, उसका अहसास आज जितना प्रासंगिक है, उतना ही वह भावुक और प्रेरणादायक भी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर को भरोसे, गर्व और जिम्मेदारी से देखा — कहा कि अब देश को वंदे मातरम् के उस गौरव को फिर से हासिल करना है, उसे नए युग में फिर से जिंदा करना है।
आज जब हम वंदे मातरम् का 150वाँ वर्ष मना रहे हैं, हमें न सिर्फ उसके गीत को गुनगुनाना चाहिए, बल्कि उसकी आत्मा को महसूस करना चाहिए — स्वतंत्रता, एकता और देशभक्ति की भावना को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।
