Spread the love

By: Ravindra Sikarwar

ग्वालियर में आयोजित 101वें तानसेन संगीत समारोह की तीसरी संध्या बुधवार को सुर, ताल और भक्ति के अद्भुत संगम के रूप में स्मरणीय बन गई। सायंकालीन संगीत सभाओं में गायन और वादन की ऐसी सधी हुई प्रस्तुतियां हुईं, जिन्होंने श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत की गहराइयों में ले जाकर एक अलौकिक आनंद का अनुभव कराया। जैसे-जैसे शाम ढलती गई, वैसे-वैसे रागों की गंभीरता, बंदिशों की शालीनता और वाद्य-संगीत की जीवंत लय वातावरण में घुलती चली गई। पूरा परिसर मानो सुरों की पवित्र साधना से आलोकित हो उठा।

परंपरा के अनुरूप संगीत सभा का शुभारंभ ध्रुपद गायन से हुआ। शारदा नाद मंदिर संगीत महाविद्यालय, ग्वालियर के विद्यार्थियों ने अपने अनुशासित और साधना-परिपक्व गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राग मारू बिहाग में चौताल की रचना ‘प्रथम नाद सुर साधे’ प्रस्तुत की। इस प्रस्तुति में सुरों की शुद्धता, लय की स्थिरता और भावों की गहराई स्पष्ट रूप से झलक रही थी। युवा कलाकारों का आत्मविश्वास और समर्पण दर्शकों को ध्रुपद की परंपरागत गरिमा से जोड़ता चला गया, जिससे वातावरण में एक आध्यात्मिक अनुभूति व्याप्त हो गई।

इसके पश्चात मंच पर मुंबई से पधारे प्रख्यात शहनाई वादक पंडित शैलेष भागवत की प्रस्तुति हुई, जिसने संध्या को भावुक स्मृतियों और मधुर रस से भर दिया। उन्होंने अपनी शहनाई वादन की शुरुआत राग शुद्ध कल्याण से की। विलंबित एकताल में आलाप के माध्यम से राग की गंभीरता और विस्तार को सधे हुए ढंग से प्रस्तुत करते हुए उन्होंने श्रोताओं को ध्यानमग्न कर दिया। इसके बाद द्रुत तीनताल में उनकी लयकारी और तानों की सजीवता ने सभा में ऊर्जा का संचार कर दिया। शहनाई की करुण और मधुर ध्वनि ने श्रोताओं के मन को भीतर तक स्पर्श किया।

तीसरी प्रस्तुति में पुणे से आए सुविख्यात शास्त्रीय गायक संजीव अभ्यंकर ने मंच संभाला। राष्ट्रीय कुमार गंधर्व सम्मान से सम्मानित श्री अभ्यंकर की गायकी में परंपरा और नवाचार का सुंदर संतुलन देखने को मिला। उन्होंने राग जोग में ‘नाही परत चित चैन जाही, लागी सोही जाने सावरे की सेन’ बंदिश प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव-रस में डुबो दिया। इसके बाद राग भिन्न षड्ज में ‘अजहु ना आए सुघर प्रिय श्याम’ बंदिश की प्रस्तुति ने विरह और भक्ति के भावों को और अधिक सशक्त कर दिया। उनकी सधी हुई आवाज, स्पष्ट उच्चारण और राग पर मजबूत पकड़ ने श्रोताओं से खूब सराहना बटोरी।

सायंकाल की अंतिम प्रस्तुति अपने आप में विशिष्ट और अनूठी रही। चार प्रमुख शास्त्रीय वाद्यों का एक साथ संवाद संगीतप्रेमियों के लिए एक दुर्लभ अनुभव बन गया। भुवनेश्वर से आए वायलिन वादक अग्निमित्रा बेहरा, बांसुरी वादक अभिराम नंदा, तबला वादक विश्वारंजन नंदा और पखावज वादक शिवशंकर सतपति ने जैसे ही मंच संभाला, पूरा वातावरण संगीतमय ऊंचाइयों पर पहुंच गया। वायलिन की करुण ध्वनि, बांसुरी की कोमल तान, तबले की चपल लय और पखावज की गंभीर गूंज ने एक-दूसरे से संवाद करते हुए संगीत का अद्भुत संसार रच दिया।

अंत में ओडिसी संगीत की नाट्यरंगी धुन के साथ इस संध्या का समापन हुआ। यह प्रस्तुति केवल श्रवण का नहीं, बल्कि अनुभूति का विषय बन गई। श्रोताओं के मन में देर तक गूंजते सुरों के साथ तानसेन समारोह की यह तीसरी संध्या एक अविस्मरणीय स्मृति के रूप में दर्ज हो गई, जिसने शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और उसकी आध्यात्मिक शक्ति को एक बार फिर सशक्त रूप से रेखांकित किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *