By: Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले की सीमाओं में कूनो नेशनल पार्क से भटककर आए चीतों की गतिविधियां लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं। हाल ही में सामने आई जानकारी के अनुसार, इनमें से एक चीता अभी भी तिघरा और घाटीगांव के घने जंगलों में स्वच्छंद विचरण कर रहा है। कूनो की टीम सैटेलाइट कॉलर की मदद से इसकी हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखे हुए है। यह चीता पिछले काफी समय से पार्क की सीमाओं से बाहर घूम रहा है, जिससे वन विभाग और स्थानीय प्रशासन अलर्ट मोड पर है। प्रोजेक्ट चीता के तहत भारत लाए गए इन अफ्रीकी चीतों का भटकना न केवल उनकी सुरक्षा के लिए चुनौती है, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका भी बढ़ा रहा है।
कूनो नेशनल पार्क, जो श्योपुर जिले में स्थित है, चीता पzj पुनरावलोकन परियोजना का केंद्र बिंदु है। यहां नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीतों को बसाया जा रहा है। इन चीतों के गले में विशेष सैटेलाइट कॉलर लगाए जाते हैं, जो जीपीएस तकनीक से उनकी लोकेशन, गतिविधि और स्वास्थ्य की रियल-टाइम जानकारी देते हैं। इस चीते की मूवमेंट भी इसी कॉलर के जरिए ट्रैक की जा रही है। वन अधिकारियों का कहना है कि चीता स्वस्थ है और जंगली इलाके में सक्रिय रूप से घूम रहा है। तिघरा डेम और घाटीगांव के जंगल घने हैं, जहां शिकार की उपलब्धता अच्छी है, शायद यही वजह है कि यह चीता यहां रुका हुआ है।
यह कोई पहली घटना नहीं है जब कूनो के चीते पार्क की सीमाएं लांघकर बाहर निकले हों। पहले भी कई चीते मुरैना, ग्वालियर और यहां तक कि राजस्थान की सीमाओं तक पहुंच चुके हैं। उदाहरण के तौर पर, मादा चीता वीरा ने कई बार जंगल छोड़कर गांवों में प्रवेश किया और बकरियों का शिकार किया। इसी तरह, अन्य चीतों के शावक भी भटककर हाईवे पर पहुंचे, जहां दुर्भाग्यवश वाहनों की चपेट में आने से कुछ की मौत हो गई। हाल ही में घाटीगांव इलाके में एक चीते के शावक की सड़क दुर्घटना में मौत ने सबको झकझोर दिया। ऐसे मामलों से साफ है कि चीतों का बड़े क्षेत्र में फैलना प्राकृतिक है, लेकिन घनी आबादी और सड़कों वाले इलाकों में यह खतरनाक साबित हो रहा है।
वन विभाग की टीमें दिन-रात मुस्तैद हैं। सैटेलाइट डेटा के आधार पर चीते की लोकेशन का पता लगाया जा रहा है और अगर जरूरत पड़ी तो उसे सुरक्षित वापस कूनो लाने का प्रयास किया जाएगा। स्थानीय ग्रामीणों को भी अलर्ट किया गया है कि जंगल के पास अकेले न जाएं, मवेशियों पर नजर रखें और कोई संदिग्ध गतिविधि दिखे तो तुरंत सूचना दें। घाटीगांव और तिघरा जैसे क्षेत्रों में पुलिस गश्त बढ़ा दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीतों को नए पर्यावरण में ढलने में समय लगता है, और बड़े क्षेत्र की जरूरत होती है। कूनो पार्क की क्षमता सीमित होने से ऐसे भटकाव आम हैं।
यह घटना प्रोजेक्ट चीता की सफलता और चुनौतियों दोनों को दर्शाती है। एक तरफ भारत में 70 साल बाद चीतों की वापसी ऐतिहासिक है, वहीं उनकी सुरक्षा और मानव बस्तियों से दूरी बनाए रखना बड़ी चुनौती। सरकार और वन विभाग जागरूकता अभियान चला रहे हैं, ताकि ग्रामीण चीतों से डरें नहीं बल्कि सह-अस्तित्व सीखें। अगर चीता गांव की ओर बढ़ा तो ट्रैंकुलाइज कर वापस लाया जा सकता है, जैसा पहले कई बार किया गया।
ग्वालियर और आसपास के लोग उत्साहित भी हैं और सतर्क भी। जंगल में चीते की मौजूदगी वन्यजीव प्रेमियों के लिए रोमांचक है, लेकिन सुरक्षा सबसे ऊपर है। उम्मीद है कि यह चीता जल्द सुरक्षित कूनो लौट आएगा और प्रोजेक्ट चीता नई ऊंचाइयों को छुएगा। वन्यजीव संरक्षण में ऐसी घटनाएं सामान्य हैं, लेकिन सतत निगरानी से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। सैटेलाइट तकनीक यहां बड़ी भूमिका निभा रही है, जो चीते की हर हरकत पर नजर रखती है।
समाज को भी समझना होगा कि चीते हमारे पर्यावरण का हिस्सा हैं। उनकी रक्षा से जैव विविधता मजबूत होगी। प्रशासन से अपील है कि हाईवे पर वन्यजीव क्रॉ싱 के लिए विशेष व्यवस्था की जाए, ताकि दुर्घटनाएं रुकें। यह चीते की मूवमेंट की खबर न केवल रोमांचक है, बल्कि संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाली भी।
