By: Ravindra Sikarwar
सोशल मीडिया की दुनिया में एक पुरानी कहावत फिर साबित हो रही है कि झूठ पैर वाले जूते पहनकर दौड़ता है, जबकि सत्य लंगड़ाते हुए धीरे-धीरे चलता है। कुछ दिनों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के नाम पर एक मनगढ़ंत बयान सोशल प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से फैल रहा है। इस फर्जी संदेश में भगवान परशुराम का जिक्र जोड़कर विवादास्पद बातें लिखी गई हैं, जो मूल रूप से डॉ. भागवत ने कभी कही ही नहीं। यह झूठ इतनी तेजी से वायरल हुआ कि हजारों लोगों ने इसे शेयर किया, लाइक किया और कमेंट्स किए, लेकिन सच्चाई अब जाकर सामने आ रही है।
दरअसल, डॉ. मोहन भागवत का असली बयान कुछ और है। हाल ही में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था, “यह भारत के लिए जीने का समय है, मरने का नहीं।” इस बयान में उन्होंने देशभक्ति, एकता और राष्ट्र निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर भारतीय को देश को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए और विभाजनकारी भाषा या विचारों से दूर रहना चाहिए। यह बयान राष्ट्रहित में सकारात्मक संदेश देता है, लेकिन कुछ शरारती तत्वों ने इसे तोड़-मरोड़कर या पूरी तरह बदलकर फर्जी संस्करण तैयार कर दिया। इसमें धार्मिक या जातीय विवाद पैदा करने वाली बातें जोड़ दी गईं, ताकि समाज में तनाव फैले।
इस फेक न्यूज की पड़ताल करने पर पता चला कि वायरल मैसेज एक संपादित पोस्टकार्ड या ग्राफिक के रूप में फैलाया गया। कुछ मीडिया हाउस जैसे प्रभात खबर, दैनिक जागरण और अन्य ने इसकी फैक्ट-चेकिंग की और स्पष्ट किया कि डॉ. भागवत ने ऐसा कोई विवादित बयान नहीं दिया। आरएसएस के प्रवक्ताओं और संबंधित अधिकारियों ने भी इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने बताया कि सरसंघचालक के नाम पर इस तरह की अफवाहें पहले भी फैलाई गई हैं, लेकिन हर बार सच्चाई सामने आती है।
इस घटना की जड़ें मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के कैलारस क्षेत्र में बताई जा रही हैं। एक लोकल न्यूज पेज, जिसे सुनील मौर्य नाम का व्यक्ति संचालित करता था, ने यह फर्जी पोस्ट सबसे पहले साझा किया। बाद में शोर मचने पर उस पोस्ट को डिलीट कर दिया गया, लेकिन तब तक झूठ हजारों हैंडल्स तक पहुंच चुका था। फेसबुक, व्हाट्सएप और एक्स (ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर यह आग की तरह फैला। कुछ लोग इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि अन्य अनजाने में शेयर करते रहे।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति या पेज तक सीमित नहीं है। यह डिजिटल युग की बड़ी चुनौती को उजागर करता है – फेक न्यूज और मिसइनफॉर्मेशन का तेजी से प्रसार। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और फोटोशॉप जैसे टूल्स की वजह से अब कोई भी आसानी से फर्जी इमेज, वीडियो या टेक्स्ट बना सकता है। एक झूठी पोस्ट कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जबकि फैक्ट-चेक रिपोर्ट्स को उतनी पहुंच नहीं मिल पाती। नतीजा यह होता है कि समाज में गलतफहमियां बढ़ती हैं, ध्रुवीकरण होता है और विश्वास की कमी पैदा होती है।
आरएसएस जैसे संगठन अक्सर इस तरह की अफवाहों का शिकार होते हैं। पहले भी डॉ. भागवत के नाम पर आरक्षण, धर्मांतरण या राजनीतिक मुद्दों पर फर्जी बयान वायरल हो चुके हैं। हर बार जांच में वे गलत साबित हुए। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सोशल मीडिया यूजर्स को सतर्क रहना चाहिए। किसी भी वायरल मैसेज को शेयर करने से पहले उसकी सत्यता जांचें – क्या यह आधिकारिक सोर्स से है? क्या बड़े मीडिया हाउस ने इसे कवर किया है? छोटे-मोटे पेजों या अनजान हैंडल्स से आने वाली खबरों पर आंख मूंदकर भरोसा न करें।
अंत में, यह घटना हमें याद दिलाती है कि डिजिटल दुनिया में जिम्मेदारी बहुत जरूरी है। झूठ फैलाने वाले कुछ पल का मजा लेते हैं, लेकिन उसका असर समाज पर लंबे समय तक पड़ता है। सच्चाई भले धीरे आए, लेकिन आती जरूर है। उम्मीद है कि इस बार का फैक्ट-चेक ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और फेक न्यूज की चेन टूटे। आखिरकार, एक मजबूत राष्ट्र के लिए एकजुटता और सत्य ही आधार हैं।
