By: Ravindra Sikarwar
ग्वालियर: संगीत नगरी ग्वालियर में आयोजित 101वें तानसेन समारोह के दूसरे दिन की शुरुआत शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन और गंभीर विधा ध्रुपद गायन के साथ हुई। जैसे ही मंच पर सुरों की साधना आरंभ हुई, पूरा परिसर आध्यात्मिक और सांगीतिक वातावरण में डूब गया। देश-विदेश से आए संगीत प्रेमी, साधक और कलाकार बड़ी संख्या में इस अद्भुत प्रस्तुति के साक्षी बने।
दूसरे दिन के कार्यक्रम में ध्रुपद परंपरा के सशक्त कलाकारों ने अपनी गायकी से समां बांध दिया। समारोह की शुरुआत रागों की शुद्धता और आलाप की गंभीरता के साथ की गई, जिसने श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत की गहराई से जोड़ दिया। मंच पर प्रस्तुत ध्रुपद की बंदिशों में अनुशासन, साधना और भाव का अद्भुत संतुलन देखने को मिला।
इस अवसर पर वरिष्ठ ध्रुपद गायक सुनील पावगी और घनश्याम सिसौदिया ने अपनी सधी हुई प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। दोनों कलाकारों ने पारंपरिक ध्रुपद शैली में आलाप, जोड़ और झाला के माध्यम से राग का विस्तार किया। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने की परंपरा के साथ-साथ व्यक्तिगत साधना की छाप भी स्पष्ट रूप से नजर आई। पखावज की संगत ने प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया, जिससे पूरे सभागार में ताल और लय की गूंज सुनाई देती रही।
इसके अलावा कार्यक्रम में वर्षा मित्रा, संजय आफले और संजय देवले ने भी अपनी संगीतमयी प्रस्तुतियां दीं। इन कलाकारों ने ध्रुपद की गंभीरता को बनाए रखते हुए रचनाओं में भाव और विस्तार का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया। रागों की शुद्धता, स्वर की स्थिरता और लयबद्धता ने श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत की मूल आत्मा से रूबरू कराया।
कार्यक्रम के दौरान दर्शकों की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही। ठंड के बावजूद बड़ी संख्या में संगीत प्रेमी कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे और देर रात तक सुरों की इस यात्रा का आनंद लिया। हर आलाप के बाद तालियों की गूंज यह बताने के लिए काफी थी कि श्रोताओं ने कलाकारों की साधना को खुले दिल से सराहा।
तानसेन समारोह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की जीवंत परंपरा का प्रतीक माना जाता है। तानसेन की कर्मभूमि ग्वालियर में आयोजित यह समारोह हर वर्ष संगीत के विभिन्न आयामों को सामने लाता है। दूसरे दिन का ध्रुपद सत्र इस बात का प्रमाण रहा कि आज भी शास्त्रीय संगीत की जड़ें उतनी ही मजबूत हैं और नई पीढ़ी में भी इसे लेकर गहरी रुचि देखने को मिल रही है।
कार्यक्रम के दौरान संगीत विशेषज्ञों और विद्वानों ने भी ध्रुपद गायन की महत्ता पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि ध्रुपद केवल गायन शैली नहीं, बल्कि एक साधना है, जिसमें कलाकार का आत्मिक जुड़ाव सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसी साधना की झलक दूसरे दिन की प्रस्तुतियों में साफ दिखाई दी।
समारोह के दूसरे दिन की यह सुरमई शुरुआत आने वाले कार्यक्रमों के लिए भी उत्साह का माहौल बना गई। आयोजकों के अनुसार आगामी दिनों में खयाल, ठुमरी और वादन जैसी विधाओं की प्रस्तुतियां होंगी, जिनमें देश के जाने-माने कलाकार हिस्सा लेंगे। कुल मिलाकर, तानसेन समारोह का दूसरा दिन ध्रुपद की गंभीर और दिव्य ध्वनियों के साथ ग्वालियर के सांस्कृतिक इतिहास में एक और यादगार अध्याय जोड़ गया।
