By: Ravindra Sikarwar
उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता को अक्सर चुनावी सफलता की गारंटी माना जाता है। लेकिन अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट इस धारणा को बार-बार चुनौती देती नजर आई है। मजबूत राष्ट्रवादी माहौल, केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार, और बड़े चेहरों की मौजूदगी के बावजूद गौरीगंज अब तक भाजपा के लिए अजेय किला साबित हुई है। यहां समाजवादी पार्टी ने लगातार अपनी पकड़ बनाए रखी है, जिससे यह सीट प्रदेश की सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहेलियों में शामिल हो गई है।
गौरीगंज विधानसभा सीट पर अब तक हुए चुनावों पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि यहां मतदाताओं का रुझान व्यक्तियों और स्थानीय समीकरणों पर ज्यादा निर्भर रहा है, न कि केवल राष्ट्रीय लहर पर। लगातार तीन बार समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार यहां से विधायक चुने गए हैं। मौजूदा विधायक रहे राकेश सिंह ने उस दौर में भी जीत दर्ज की, जब पूरे प्रदेश में मोदी–योगी की लहर अपने चरम पर थी। हालांकि अब राकेश सिंह का पार्टी से अलग हो जाना सपा के लिए नई चुनौती बनकर सामने आया है।
राकेश सिंह के सपा छोड़ने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी उनके विकल्प के रूप में किस चेहरे को मैदान में उतारेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गौरीगंज में समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक अब भी मजबूत है। यही कारण रहा है कि भाजपा के कड़े मुकाबले के बावजूद सपा यहां हर बार जीत हासिल करती रही। गांवों और कस्बों में पार्टी की जमीनी पकड़, स्थानीय नेताओं की सक्रियता और सामाजिक समीकरण सपा के पक्ष में जाते रहे हैं।
दूसरी ओर, भाजपा भी इस सीट को लेकर गंभीर रणनीति बनाने में जुटी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार गौरीगंज से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा में कई दावेदार सक्रिय हैं। कांग्रेस के कुछ नेता भी इस सीट पर संभावनाएं तलाश रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन नेताओं में से कुछ की समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही हैं, जिससे आने वाले समय में बड़े राजनीतिक फेरबदल की अटकलें तेज हो गई हैं।
यदि 2022 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो गौरीगंज में मुकाबला बेहद रोचक रहा था। समाजवादी पार्टी की ओर से राकेश सिंह उम्मीदवार थे, जबकि भाजपा ने चंद्र प्रकाश मिश्र ‘मटियारी’ को मैदान में उतारा था। चुनावी नतीजों में राकेश सिंह ने तीसरी बार जीत दर्ज की, जबकि भाजपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। उस चुनाव में भाजपा की हार के पीछे पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह को बड़ी वजह माना गया। चर्चा रही कि कुछ स्थानीय नेताओं ने खुलकर सपा उम्मीदवार का समर्थन किया, जिससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा।
यह सब उस समय हुआ, जब अमेठी से सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री स्मृति ईरानी थीं। इसके बावजूद अमेठी और गौरीगंज दोनों विधानसभा सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में चली गईं। हालांकि जिले की बाकी सीटों पर तस्वीर थोड़ी अलग रही। तिलोई, जगदीशपुर और सलोन विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने जीत दर्ज की, जिससे अमेठी जिले में भाजपा और सपा की मिली-जुली राजनीतिक स्थिति बनी रही।
अमेठी विधानसभा सीट पर भी भाजपा को अंदरूनी कलह का खामियाजा भुगतना पड़ा। पार्टी उम्मीदवार डॉ. संजय सिंह को हार का सामना करना पड़ा, जबकि जेल में बंद पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति की पत्नी महाराजी प्रजापति ने जीत हासिल की। इससे यह साफ हुआ कि जिले में केवल पार्टी का नाम नहीं, बल्कि उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता और संगठन की एकजुटता भी निर्णायक भूमिका निभाती है।
जिला पंचायत से लेकर लोकसभा तक अमेठी की राजनीति लगातार बदलते समीकरणों का उदाहरण रही है। वर्तमान में जिला पंचायत अध्यक्ष का पद भाजपा के राजेश मसाला के पास है, जबकि पहले यह सपा के नियंत्रण में था। माना जाता है कि स्मृति ईरानी की रणनीतिक सक्रियता से भाजपा ने यह बढ़त हासिल की। वहीं बहुजन समाज पार्टी की बात करें तो अमेठी की राजनीति में उसका प्रभाव लगातार कमजोर होता गया है और पार्टी लगभग हाशिये पर नजर आ रही है।
अब सभी की निगाहें 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि स्मृति ईरानी एक बार फिर अमेठी और गौरीगंज क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं। ऐसे में गौरीगंज सीट पर सपा और भाजपा दोनों के लिए यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि राजनीतिक साख का सवाल बनता जा रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार भाजपा अपना खाता खोल पाएगी या गौरीगंज एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में अपवाद बनकर उभरेगी।
