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By: Ravindra Sikarwar

मुरैना/ग्वालियर: दुनिया की सबसे स्वच्छ नदियों में शुमार चंबल नदी अब अवैध रेत खनन की भेंट चढ़ रही है। घड़ियाल, डॉल्फिन और गंगा डॉल्फिन जैसी दुर्लभ प्रजातियों के एकमात्र आश्रय स्थल राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में रेत खनन पर पूर्ण प्रतिबंध है, फिर भी मुरैना जिले की सीमा से गुजरने वाली इस नदी से दिन-रात रेत की चोरी हो रही है। राजनीतिक संरक्षण के दम पर रेत माफिया बेखौफ होकर मशीनों से नदी की तलहटी उखाड़ रहे हैं। वन विभाग, खनिज विभाग और पुलिस की तमाम टीमों के दावों के बावजूद माफिया पर लगाम नहीं लग पा रही है।

आंकड़े खुद बयाँ कर रहे हैं हकीकत
ग्वालियर-चंबल अंचल के पूर्व विधायक सतीश सिकरवार ने विधानसभा में चंबल में अवैध रेत खनन को लेकर सवाल उठाया था। उसके लिखित जवाब में जो तथ्य सामने आए, वे चौंकाने वाले हैं:

  • सामान्य वन मंडल, मुरैना ने वर्ष 2024 में अवैध रेत खनन के 260 मामले दर्ज किए थे, लेकिन 2025 के पहले 11 महीनों में सिर्फ 23 मामले ही दर्ज हुए। 
  • मुरैना पुलिस ने 1 जनवरी 2024 से 11 नवंबर 2025 तक कुल 64 मामले दर्ज किए, जिनमें 2024 में 39 और 2025 में महज 19 मामले शामिल हैं। 
  • शहर क्षेत्र के थानों में 15 और ग्रामीण इलाकों में 49 मामले दर्ज हुए।

आंकड़ों में भारी गिरावट का मतलब साफ है – या तो खनन बंद हो गया (जो सच नहीं है) या फिर कार्रवाई जानबूझकर रोकी जा रही है।

तीन वनकर्मी निलंबित, पुलिस वालों पर मेहरबानी
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में रेत माफिया से साँठ-गाँठ की शिकायतों पर वन विभाग ने तीन कर्मचारियों को निलंबित किया है: 

  • वनपाल जयनारायण जाटव – माफिया को गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप। 
  • वनरक्षक प्रभाकर शर्मा और आकाश शर्मा – माफिया से वसूली, शराब पार्टी और कार्यालय में उपद्रव के आरोप। 

वहीं पुलिस के खिलाफ गंभीर शिकायतें आईं, जिनमें टैंटरा थाना प्रभारी सुखदेव सिंह, राजौधा चौकी प्रभारी नारायण सिंह तोमर, सबलगढ़ के आरक्षक सुभाष गुर्जर व अमर सिंह रावत तथा देवगढ़ थाना प्रभारी व आरक्षक अभिषेक सिंह भदौरिया के नाम शामिल थे। लेकिन पुलिस शिकायत शाखा ने सभी शिकायतों को “अप्रमाणित” बताकर खारिज कर दिया।

NGT भी है नाराज
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने चंबल अभयारण्य में हो रहे अवैध खनन पर कड़ा संज्ञान लिया था। 2024 में कोर्ट के आदेश पर राज्य सरकार ने हलफनामा दाखिल किया, जिसमें स्वीकार किया गया कि वर्ष 2024 में 46,118.55 घन मीटर अवैध रेत जब्त की गई। यह आंकड़ा ही बताता है कि प्रतिबंध के बावजूद खनन कितने बड़े स्तर पर हो रहा है।

पुलिस और वन विभाग ने मानी हार
विधानसभा में दिए जवाब में मुरैना के पुलिस अधीक्षक और वन मंडल अधिकारी ने खुलेआम स्वीकार किया है कि “चोरी-छिपे रेत खनन और परिवहन हो रहा है”। पुलिस का कहना है कि सूचना मिलने पर खनिज विभाग के साथ समन्वय करके कार्रवाई की जाती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रात के अंधेरे में ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ, जेसीबी और पोकलेन मशीनें खुलेआम नदी में उतर रही हैं और कोई रोकटोक नहीं कर पा रहा।

राजनीतिक संरक्षण की खुली पोल
स्थानीय लोग और सामाजिक कार्यकर्ता बार-बार आरोप लगा रहे हैं कि बड़े रेत माफिया को ऊँचे स्तर का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। कई मौजूदा और पूर्व जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों व करीबियों के नाम इस धंधे में खुलेआम लिए जा रहे हैं। छोटे कर्मचारियों को निलंबित करके और कुछ प्रकरण दर्ज करके विभाग ऊपरी तौर पर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं, लेकिन असल सरगनाओं पर हाथ डालने की हिम्मत कोई नहीं दिखा पाता।

चंबल की रेत अब सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं, बल्कि कुछ लोगों की काली कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है। घड़ियाल और डॉल्फिन की आखिरी पनाहगाह को बचाने के सारे दावे खोखले साबित हो रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ सालों में चंबल की तलहटी में सिर्फ गड्ढे रह जाएँगे और दुर्लभ प्रजातियाँ हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगी।

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