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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा है कि “न्याय प्राप्त करने वाले व्यक्ति की समझ वाली भाषा में ही न्याय दिया जाना चाहिए”, जिससे अब सभी उच्च न्यायालयों को अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में फैसले और आदेश लिखने की पूरी स्वतंत्रता मिल गई है। यह टिप्पणी जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस ए.एस. ओका की पीठ ने एक विशेष अनुमति अर्जी (एसएलपी) की सुनवाई के दौरान की। इस मामले में उत्तर प्रदेश के एक शख्स ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के हिंदी में दिए गए आदेश का अंग्रेजी अनुवाद मांगा था। कोर्ट ने अर्जी ठुकराते हुए साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 348(1)(a) के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में बहस अंग्रेजी में होगी, लेकिन अंतिम फैसले क्षेत्रीय भाषा में लिखे जा सकते हैं—इसमें कोई पाबंदी नहीं है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि 2024 का इलाहाबाद हाई कोर्ट का हिंदी आदेश उसे समझ नहीं आया, क्योंकि वह कानूनी अंग्रेजी का आदी था। कोर्ट ने इसे नामंजूर करते हुए कहा, “न्याय पक्षकार की समझ के लिए है, न कि वकील या जज की सुविधा के लिए। यदि कोई कोर्ट हिंदी, मराठी, तमिल या अनुसूची 8 की किसी भाषा में फैसला लिखता है, तो यह पूरी तरह संवैधानिक है।” कोर्ट ने आगे बताया कि अनुच्छेद 348(2) के तहत राज्यपाल की मंजूरी से हाई कोर्ट को स्थानीय भाषा में फैसला देने का अधिकार है, और कई राज्य इसे पहले से इस्तेमाल कर रहे हैं।

यह फैसला भारत की बहुभाषी संस्कृति को ध्यान में रखकर आया है, जहां 22 सरकारी भाषाएं और सैकड़ों बोलियां प्रचलित हैं। अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट हिंदी में, बॉम्बे हाई कोर्ट मराठी में, मद्रास हाई कोर्ट तमिल में और राजस्थान हाई कोर्ट हिंदी में फैसले दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मिसाल दी कि गुजरात हाई कोर्ट गुजराती में, केरल हाई कोर्ट मलयालम में और कर्नाटक हाई कोर्ट कन्नड़ में आदेश जारी कर सकता है—बशर्ते राज्य सरकार सहमत हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई पक्ष अंग्रेजी अनुवाद चाहता है, तो उसे कोर्ट से लिखित आवेदन करना होगा, लेकिन यह उसका हक नहीं है।

कानून के जानकारों का कहना है कि यह कदम न्याय को आम जनता के करीब लाएगा। प्रसिद्ध वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा, “90 फीसदी केस लड़ने वाले साधारण लोग हैं, जो अंग्रेजी नहीं जानते। अपनी भाषा में फैसला पढ़कर वे अपने हक को बेहतर समझेंगे।” हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि अलग-अलग भाषाओं के फैसलों से अपील में अनुवाद की त्रुटियां हो सकती हैं। कोर्ट ने इसका जवाब दिया कि अनुवाद की जिम्मेदारी रजिस्ट्रार की होगी और प्रमाणित कॉपी दी जाएगी।

यह निर्णय 10 नवंबर 2025 को सुनाया गया और तुरंत लागू हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स को आदेश दिया कि वे अपनी भाषा नीति स्पष्ट करें और मुकदमेबाजों को भाषा विकल्प की जानकारी दें। यह कदम ‘सबको न्याय’ के सिद्धांत को मजबूत करता है और देश की भाषाई विविधता को अदालती प्रक्रिया में शामिल करता है। आने वाले समय में इससे कानूनी किताबें और दस्तावेज स्थानीय भाषाओं में अनुवादित होंगे।

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