By: Ravindra Sikarwar
हमारे स्मार्टफोन पर एक टैप और कुछ ही मिनटों में सामान घर पर पहुंच जाता है। यह सुविधा कितनी आसान लगती है, लेकिन इसके पीछे डिलीवरी एग्जीक्यूटिव्स की लंबी मेहनत, थकावट और जोखिम छिपे होते हैं, जो अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। हाल ही में उत्तराखंड के थापलियाल जी नाम के एक Blinkit डिलीवरी पार्टनर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसने गिग वर्कर्स की मुश्किलों को फिर से spotlight में ला दिया। वीडियो में उन्होंने एक दिन की कमाई का हिसाब दिखाया – 15 घंटे की लगातार बाइक चलाने और 28 ऑर्डर डिलीवर करने के बाद कुल कमाई मात्र 763 रुपये। एक ऑर्डर की अंतिम पेमेंट तो सिर्फ 15.83 रुपये थी। महंगाई के इस जमाने में इतनी कम कमाई से परिवार चलाना कितना चुनौतीपूर्ण है, यह आसानी से समझा जा सकता है।
यह वीडियो सितंबर में रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन दिसंबर में दोबारा वायरल होने पर इसने पूरे देश में बहस छेड़ दी। सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे गिग इकोनॉमी में श्रम का शोषण बताया। कई लोगों ने Blinkit को टैग करके सवाल उठाए कि इतने कम वेतन और 10 मिनट की डिलीवरी के दबाव में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा और जीवन की जिम्मेदारी कौन लेगा? कुछ ने इसे इंसानियत के खिलाफ करार दिया। ग्राहकों से अपील भी की गई कि डिलीवरी पार्टनर्स को टिप जरूर दें, क्योंकि उनकी वास्तविक आय अक्सर टिप्स पर ही निर्भर करती है। यहां तक कि AAP सांसद राघव चड्ढा ने संसद में इस मुद्दे को उठाया और थापलियाल जी को लंच पर आमंत्रित किया, जहां गिग वर्कर्स की स्थिति पर चर्चा हुई।
थापलियाल जी ने अपने अन्य वीडियोज में स्पष्ट किया कि हर दिन कमाई एक समान नहीं होती। अक्टूबर के एक वीडियो में उन्होंने बताया कि 11 घंटे काम करके 32 ऑर्डर पूरे करने पर 1,202 रुपये मिले। पीक सीजन या व्यस्त दिनों में 1,600 से 2,000 रुपये तक की कमाई संभव है, लेकिन कम ऑर्डर वाले या दूर की डिलीवरी में 1,000 रुपये भी मुश्किल से जुट पाते हैं। यह गिग इकोनॉमी की अनिश्चितता को दर्शाता है, जहां मेहनत के बावजूद आय स्थिर नहीं रहती। ईंधन खर्च, बाइक मेंटेनेंस और जोखिम को जोड़ें तो नेट कमाई और कम हो जाती है।
यह मुद्दा सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि लाखों गिग वर्कर्स का है। विशेषज्ञों और गिग वर्कर्स यूनियनों का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स को वर्कर्स को ‘पार्टनर’ की जगह कर्मचारी का दर्जा देना चाहिए। तब ही श्रम कानूनों का लाभ मिल सकेगा, जैसे न्यूनतम वेतन, सोशल सिक्योरिटी, बीमा और छुट्टियां। वर्तमान में ये वर्कर्स स्वतंत्र ठेकेदार माने जाते हैं, इसलिए कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती। यूनियनों ने मांग की है कि 10 मिनट डिलीवरी जैसे मॉडल बंद हों, क्योंकि ये दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ाते हैं। साथ ही, प्लेटफॉर्म की कटौती सीमित हो, आईडी ब्लॉकिंग पर रोक लगे और निष्पक्ष अपील सिस्टम बने।
इसी असंतोष के चलते गिग वर्कर्स ने बड़ा कदम उठाया है। इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) और तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन सहित कई संगठनों ने 31 दिसंबर 2025 को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। यह हड़ताल Zomato, Swiggy, Blinkit, Zepto, Amazon और Flipkart जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स को प्रभावित करेगी। पहले 25 दिसंबर को भी हड़ताल हुई थी, जिसमें हजारों वर्कर्स शामिल हुए और कई शहरों में डिलीवरी सेवाएं बाधित रहीं। अब नए साल की पूर्व संध्या पर यह हड़ताल और बड़ा असर डालेगी, क्योंकि यह साल का सबसे व्यस्त दिन होता है – पार्टी ऑर्डर्स, ग्रॉसरी और गिफ्ट्स की मांग चरम पर रहती है।
यूनियनों का कहना है कि कंपनियां मुनाफा कमाती हैं, लेकिन वर्कर्स की आय घट रही है। एल्गोरिदम आधारित दंड, मनमानी आईडी ब्लॉकिंग और असुरक्षित कामकाज की स्थितियां असहनीय हो गई हैं। सरकार से भी अपील की गई है कि गिग वर्कर्स के लिए बने नए कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए, जैसे कर्नाटक का प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स एक्ट। अगर हड़ताल में बड़े पैमाने पर भागीदारी हुई, तो ग्राहकों को लंबा इंतजार या ऑर्डर कैंसिलेशन का सामना करना पड़ सकता है।
यह हड़ताल न केवल कमाई की लड़ाई है, बल्कि सम्मान और सुरक्षा की भी। गिग इकोनॉमी भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसे मजबूत बनाने के लिए वर्कर्स की स्थिति सुधारना जरूरी है। उम्मीद है कि यह विरोध कंपनियों और नीति निर्माताओं को सोचने पर मजबूर करेगा, ताकि सुविधा देने वाले इन ‘अदृश्य हीरोज’ को उचित हक मिल सके।
