By: Ravindra Sikarwar
ग्वालियर: इस साल की आखिरी पूर्णिमा ने पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना लिया। गुरुवार शाम को जैसे ही सूरज डूबा, पूर्वी क्षितिज पर एक विशाल, चमकदार और सुनहरे रंग का चाँद धीरे-धीरे ऊपर उठा। इसे खगोल वैज्ञानिकों ने “कोल्ड सुपरमून” या “शीत पूर्णिमा” का नाम दिया है, क्योंकि दिसंबर का महीना उत्तरी गोलार्ध में ठंड का चरम होता है। लेकिन इस बार यह सिर्फ कोल्ड मून नहीं था, बल्कि साल 2025 का अंतिम सुपरमून भी था। यानी चाँद पृथ्वी के सबसे करीब था, इसलिए सामान्य पूर्णिमा से कहीं ज्यादा बड़ा और चमकीला दिखाई दिया।
चाँद क्यों दिखा इतना विशाल और चमकदार?
प्रसिद्ध विज्ञान संचारक सारिका घारू ने बताया कि 4-5 दिसंबर की रात चंद्रमा पृथ्वी से मात्र 3,57,218 किलोमीटर की दूरी पर था। यह दूरी सामान्य पूर्णिमा की तुलना में काफी कम है। जब चंद्रमा अपनी कक्षा के उस बिंदु पर पहुँचता है जिसे “पेरिजी” (Perigee) कहते हैं, यानी पृथ्वी का सबसे निकटतम बिंदु, तब उसे सुपरमून कहा जाता है।
सारिका के अनुसार:
- सुपरमून में चाँद सामान्य पूर्णिमा से लगभग 14 प्रतिशत बड़ा दिखता है।
- इसकी चमक 30 प्रतिशत तक अधिक होती है।
- क्षितिज के पास चाँद के निकलते समय “मून इल्यूजन” (Moon Illusion) की वजह से वह और भी बड़ा प्रतीत होता है। यह एक ऑप्टिकल भ्रम है, जिसमें हमारा दिमाग चाँद को पेड़ों, इमारतों या पहाड़ों के ऊपर देखकर उसे और विशाल समझ लेता है।
यह सुपरमून शुक्रवार तड़के 4 बजकर 44 मिनट पर अपने सबसे नजदीकी बिंदु पर पहुँचा। इसके बाद धीरे-धीरे दूरी बढ़ने लगेगी।
कोल्ड मून को अन्य नाम भी
दुनिया के अलग-अलग संस्कृतियों में दिसंबर की पूर्णिमा को कई सुंदर नामों से पुकारा जाता है:
- कोल्ड मून (Cold Moon) – ठंड के कारण
- लॉन्ग नाइट मून (Long Night Moon) – क्योंकि दिसंबर में रातें सबसे लंबी होती हैं
- अमेरिका के मूल निवासियों में इसे “मून बिफोर यूल” भी कहते हैं, क्योंकि यह क्रिसमस से ठीक पहले आती है।
सुपरमून और बक मून में फर्क
लोग अक्सर पूछते हैं कि साल में कई सुपरमून आते हैं, फिर हर बार अलग-अलग नाम क्यों? दरअसल हर पूर्णिमा का अपना पारंपरिक नाम होता है:
- जुलाई का सुपरमून “बक मून” कहलाता है, क्योंकि उस समय नर हिरणों (Buck) के नए सींग उग आते हैं।
- कुछ जगहों पर जुलाई के चाँद को “थंडर मून” भी कहते हैं, क्योंकि उस मौसम में गरज-चमक वाली बारिश ज्यादा होती है।
- इसी तरह जनवरी में आने वाले सुपरमून को “वुल्फ मून” कहते हैं।
2025 में अब कोई सुपरमून नहीं बचेगा। अगला इतना नजदीकी और शानदार सुपरमून देखने के लिए हमें 23 दिसंबर 2026 तक इंतजार करना होगा।
लोगों ने कैसे लिया लुत्फ?
शहरों से लेकर गाँव तक, छतों से लेकर खेतों तक, हर जगह लोग इस नजारे को देखने के लिए रात भर जागते रहे। भोपाल की अपर लेक, इंदौर की पिपलीयापाला झील, ग्वालियर का किला परिसर, उज्जैन के शिप्रा घाट और जबलपुर की संगमरमर की चट्टानों पर हजारों लोग इकट्ठा हुए। सोशल मीडिया पर #ColdSupermoon, #सुपरमून2025 और #कोल्डमून हैशटैग ट्रेंड करने लगे। बच्चे, बूढ़े, फोटोग्राफर्स, प्रेमी जोड़े – हर कोई इस जादुई रात का गवाह बना।
खगोल प्रेमियों ने बताया कि इस बार का सुपरमून इसलिए भी खास था क्योंकि मौसम एकदम साफ था। कहीं कोहरा नहीं, कहीं बादल नहीं – बस साफ नीला-काला आकाश और उसमें चमकता हुआ विशाल चाँद। कई लोगों ने इसे अपने मोबाइल कैमरे से ज़ूम करके फोटो खींचे और हैरान रह गए कि चाँद के गड्ढे (craters) तक साफ दिखाई दे रहे थे।
विज्ञान और संस्कृति का सुंदर मेल
भारतीय परंपरा में पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इसे पूर्णिमा व्रत, सत्यनारायण कथा, गुरु पूर्णिमा या शरद पूर्णिमा जैसे पर्वों से जोड़ा जाता है। इस बार कोल्ड सुपरमून के दिन कई घरों में खीर बनाई गई, क्योंकि मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की तरह दिसंबर की पूर्णिमा की चाँदनी में भी औषधीय गुण होते हैं।
इस खूबसूरत रात ने एक बार फिर याद दिलाया कि प्रकृति और विज्ञान कितने अद्भुत हैं। साल का अंतिम सुपरमून ऐसा उपहार लेकर आया, जिसे न तो कोई खरीद सकता है, न बेच सकता है – बस आँखें खोलकर देख सकता है और दिल भर सकता है।
अब अगले साल का इंतजार है – नया साल, नई पूर्णिमाएँ, नए सुपरमून और नई कहानियाँ!
