Swami SachchidanandSwami Sachchidanand
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Swami Sachchidanand : विंध्य क्षेत्र के सुप्रसिद्ध संत और धारकुंडी आश्रम के पीठाधीश्वर परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज का 102 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। उनके ब्रह्मलीन होने की खबर से पूरे विंध्य अंचल में शोक का माहौल है। संत के अंतिम दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु सतना जिले स्थित धारकुंडी आश्रम पहुंच रहे हैं। उनकी पार्थिव देह को आश्रम परिसर में दर्शनार्थ रखा गया है, जबकि सोमवार को वहीं समाधि दी जाएगी।

अंतिम दर्शन के लिए आश्रम पहुंचेंगे मुख्यमंत्री

Swami Sachchidanand परमहंस सच्चिदानंद महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव रविवार को दोपहर धारकुंडी आश्रम पहुंचेंगे। इससे पहले उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल संत के अंतिम दर्शन कर चुके हैं। संत के निधन पर राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जगत की कई हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है और उन्हें आध्यात्मिक चेतना का मार्गदर्शक बताया है।

वैराग्य और साधना से भरा रहा जीवन

Swami Sachchidanand परमहंस सच्चिदानंद महाराज ने मात्र 22 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग कर वैराग्य धारण कर लिया था। इसके बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव कल्याण, साधना और आध्यात्मिक जागरण में समर्पित कर दिया। उनके द्वारा रचित ‘मानस बोध’ और ‘गीता बोध’ जैसे ग्रंथ आज भी श्रद्धालुओं और साधकों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनके प्रवचनों पर आधारित कई पुस्तकों का प्रकाशन भी आश्रम द्वारा किया गया, जो समाज को नैतिक और आध्यात्मिक दिशा देने का कार्य कर रही हैं। संत ने अपने जीवनकाल में ही अपने समाधि स्थल का चयन कर लिया था।

संतों की उपस्थिति और सुरक्षा के कड़े इंतजाम

Swami Sachchidanand संत के ब्रह्मलीन होने की सूचना मिलते ही विभिन्न संप्रदायों के संत धारकुंडी आश्रम पहुंचने लगे। चुनार स्थित सक्तेशगढ़ आश्रम के स्वामी अडग़ड़ानंद महाराज, श्री श्री 1008 रामायण महाराज, वीरेंद्र कुमार महाराज और विजय महाराज सहित अनेक संत आश्रम में मौजूद हैं। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। करीब 500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है और वाहनों की पार्किंग के लिए आश्रम से कुछ दूरी पर विशेष व्यवस्था की गई है।

धारकुंडी आश्रम का आध्यात्मिक महत्व

Swami Sachchidanand घने जंगलों और पवित्र जलधारा के बीच स्थित धारकुंडी आश्रम का धार्मिक महत्व अत्यंत प्राचीन है। यह क्षेत्र पांडवों के वनवास और अघमर्षण तीर्थ से जुड़ा माना जाता है। चित्रकूट की चौरासी कोस परिक्रमा में भी धारकुंडी का विशेष स्थान है। परमहंस सच्चिदानंद महाराज का जीवन और साधना इस तीर्थ की आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक ऊंचाई प्रदान करती रहेगी।

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