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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज हिमाचल प्रदेश में व्याप्त पर्यावरणीय संकट पर अपना महत्वपूर्ण आदेश सुनाने का फैसला किया है। यह मामला राज्य में हाल के वर्षों में हुई भूस्खलनों, बाढ़ों और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न आपातकालीन स्थिति से जुड़ा है, जिसकी जांच अदालत ने स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए शुरू की थी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने 15 सितंबर को सुनवाई के दौरान चिंता जताई थी कि न केवल हिमाचल बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में पारिस्थितिक असंतुलन के कारण स्थिति “बहुत हिंसक” हो गई है, और यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट पूरे क्षेत्र को मानचित्र से मिटा सकता है। आज के आदेश में केंद्र और राज्य सरकारों से विस्तृत कार्ययोजना की मांग की जा सकती है, जिसमें विकास परियोजनाओं पर नियंत्रण, वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय शामिल होंगे।

हिमाचल प्रदेश, जो हिमालय की गोद में बसा है, पिछले कुछ वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बन रहा है। 2025 के मानसून में ही राज्य में भारी तबाही हुई, जिसमें सैकड़ों लोग भूस्खलन और बाढ़ में जान गंवा चुके हैं, जबकि हजारों संपत्तियां नष्ट हो गईं। राज्य सरकार की 23 अगस्त 2025 को प्रस्तुत 65 पृष्ठों की रिपोर्ट के अनुसार, हिमालयी हिमनदों का अध्ययन (2001-2002 बनाम 2016-2019) दर्शाता है कि हालांकि हिमनदों की संख्या स्थिर रही, लेकिन उनका कुल क्षेत्रफल सिकुड़ गया है, जो जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। रिपोर्ट में उच्च तीव्रता वाली वर्षा, बादल फटना, बिजली चमकना, बर्फबारी में बदलाव और हिमनदों के पिघलने को वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, औद्योगिकीकरण और क्षेत्रीय स्तर पर अनियोजित गतिविधियों का परिणाम बताया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, 2015 से 2025 के बीच भूस्खलनों में 370% की वृद्धि हुई है, जबकि बाढ़ों में छह गुना इजाफा दर्ज किया गया है। ग्लेशियर झील आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) जैसी नई चुनौतियां भी उभर रही हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की शुरुआत अगस्त 2025 में की थी, जब उसने एम/एस प्रिस्टाइन होटल्स एंड रिसॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य के एक याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका राज्य उच्च न्यायालय के 2 जुलाई 2025 के आदेश के खिलाफ थी, जिसमें 6 जून 2025 की राज्य सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। इस अधिसूचना के तहत श्री तारा माता हिल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को “हरित क्षेत्र” घोषित कर निजी निर्माण पर रोक लगाई गई थी। उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक व्यापक पर्यावरणीय मुद्दे के रूप में देखा। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा था कि “हिमाचल की स्थिति बद से बदतर हो गई है। गंभीर पारिस्थितिक असंतुलन ने वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दिया है।” अदालत ने चेतावनी दी थी कि अनियंत्रित विकास से राज्य “मानचित्र से गायब” हो सकता है।

15 सितंबर की सुनवाई में अदालत ने हिमालयी क्षेत्र के पूरे हिस्से को शामिल करने का निर्णय लिया, जिसमें उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर भी आते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर, जो एमिकस क्यूरी के रूप में सहायता कर रहे हैं, ने राज्य की रिपोर्ट पेश की, जिसमें वृक्ष आवरण, वन कटाई और अनियोजित निर्माण जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई। अदालत ने कहा कि हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स, चार-लेन सड़कें, बहु-मंजिला भवन और पर्यटन से प्रेरित विकास ने पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाया है। हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के पास रहने वाले समुदायों ने पानी की कमी, भूस्खलन और घरों में दरारें की शिकायतें की हैं, क्योंकि प्रोजेक्ट संचालक न्यूनतम जल प्रवाह का पालन नहीं कर रहे, जिससे जलीय जीवन नष्ट हो रहा है। अदालत ने विकास परियोजनाओं से पहले भूवैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की राय लेने पर जोर दिया।

हिमाचल में हाल की आपदाओं से पुनर्वास कार्य अभी भी जारी है। 2025 के मानसून में मंडी, कुल्लू, किन्नौर और शिमला जैसे जिलों में भारी नुकसान हुआ, जहां सड़कें, पुल और घर ध्वस्त हो गए। राज्य सरकार ने आपदा राहत के लिए केंद्र से सहायता मांगी है, लेकिन अदालत ने नीतिगत विफलताओं पर सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आज का आदेश हिमालयी राज्यों के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है, जिसमें सख्त पर्यावरणीय नियम, वन संरक्षण नीतियां और सतत विकास मॉडल पर जोर दिया जाएगा। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अदालत का स्वागत किया है, लेकिन चेतावनी दी है कि कार्यान्वयन में देरी घातक होगी।

यह मामला न केवल हिमाचल के लिए बल्कि पूरे भारत के लिए एक सबक है, जहां जलवायु परिवर्तन मानवीय गतिविधियों से बढ़ रहा है। अदालत के आदेश से उम्मीद है कि ठोस कदम उठेंगे, जैसे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर निगरानी, वन कटाई पर रोक और हरित निर्माण मानकों का सख्त पालन। हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है कि राज्य अदालत के निर्देशों का पालन करने को तैयार है और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देगा।

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