by-Ravindra Sikarwar
सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा एक महत्वपूर्ण मामला, जिसमें यह तय किया जाना है कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर निर्णय लेने की कोई समय सीमा तय की जा सकती है। यह मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है, क्योंकि कई बार यह देखा गया है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति किसी विधेयक को मंजूरी देने, उसे वापस भेजने या अपने पास रोके रखने में काफी समय लगा देते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, राज्यपाल को राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी विधेयक पर अपनी सहमति देने, उसे रोककर रखने, या विधानसभा को पुनर्विचार के लिए वापस भेजने का अधिकार है। इसी तरह, अनुच्छेद 111 के तहत राष्ट्रपति के पास भी संसद द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में समान शक्तियां हैं। संविधान में कहीं भी इन फैसलों के लिए कोई विशिष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
इसी कारण, कई राज्यों में, विशेष रूप से जहां केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें हैं, राज्यपालों पर विधेयकों को लंबे समय तक रोके रखने का आरोप लगता रहा है। इससे राज्य सरकारों के कामकाज में बाधा आती है और कई महत्वपूर्ण विधेयक अनिश्चित काल के लिए लंबित हो जाते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई:
सर्वोच्च न्यायालय इस मामले की सुनवाई कर रहा है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या इस संवैधानिक “मौन” को भरा जा सकता है और कोई समय सीमा तय की जा सकती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना किसी समय सीमा के, राज्यपाल या राष्ट्रपति की शक्ति मनमानी हो जाती है और यह संवैधानिक लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है। उनका कहना है कि यह “पॉकेट वीटो” (Pocket Veto) के समान है, जिससे सरकार की विधायी प्रक्रियाएं बाधित होती हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए विभिन्न पक्षों से उनकी राय मांगी है। न्यायालय यह भी विचार कर रहा है कि यदि कोई समय सीमा निर्धारित की जाती है, तो वह कितनी होनी चाहिए और क्या यह संविधान के मौजूदा प्रावधानों के अनुरूप होगी।
संभावित परिणाम:
इस मामले का फैसला भारतीय संघीय व्यवस्था के लिए दूरगामी परिणाम वाला हो सकता है। यदि न्यायालय कोई समय सीमा निर्धारित करता है, तो इससे विधेयकों के लंबित रहने की समस्या का समाधान हो सकता है और केंद्र-राज्य संबंधों में एक नई स्पष्टता आ सकती है। हालांकि, यह भी एक संवैधानिक चुनौती है क्योंकि यह सीधे तौर पर राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों को प्रभावित करेगा। इस फैसले से भविष्य में विधायी प्रक्रियाओं को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाया जा सकता है।
