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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा के चलन को “अमानवीय और गरिमा के खिलाफ” करार दिया है। कोर्ट ने इस प्रथा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से इसे चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने और इसमें लगे रिक्शा चालकों के उचित पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाने को कहा है।

न्यायालय ने कहा कि आधुनिक समाज में किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी में यात्रा करना, उसकी गरिमा के खिलाफ है। यह न केवल रिक्शा खींचने वाले व्यक्ति के लिए शारीरिक रूप से अत्यधिक कठिन है, बल्कि यह मानव सम्मान के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता है।

कोर्ट का निर्देश और सरकार को सुझाव:
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सुझाव दिया है कि:

  • पुनर्वास योजना: रिक्शा चलाने वालों को वैकल्पिक आजीविका प्रदान करने के लिए एक व्यापक पुनर्वास योजना बनाई जाए। इसमें उन्हें ई-रिक्शा खरीदने के लिए सब्सिडी, प्रशिक्षण या अन्य छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता दी जा सकती है।
  • सामाजिक सुरक्षा: इन श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाया जाए, ताकि वे और उनके परिवार सम्मानजनक जीवन जी सकें।
  • कानूनी प्रतिबंध: चरणबद्ध तरीके से हाथ रिक्शा के संचालन पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि इस अमानवीय प्रथा को पूरी तरह खत्म किया जा सके।

रिक्शा चालकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला लाखों रिक्शा चालकों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है, जो बेहद कम आय में कड़ी मेहनत कर रहे हैं। दशकों से, ये रिक्शा चालक बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के काम कर रहे हैं। कोर्ट का यह निर्देश न केवल उनकी आजीविका को सुरक्षित करने में मदद करेगा, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान और बेहतर जीवन स्तर भी प्रदान करेगा। यह फैसला मानव गरिमा और अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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