काला चुपचाप विलाप करता है, दिल नहीं धड़कता
Struggle: समय के प्रवाह में कुछ अंतराल ऐसे आते हैं, जो व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देते हैं। रचनात्मक जीवन में आया एक लंबा विराम केवल मौन नहीं होता, बल्कि आत्मसंघर्ष, असंतोष और अनुत्तरित प्रश्नों से भरा होता है। कर्म के प्रति निष्ठा और न्यायसम्मत प्रयासों के बावजूद अपेक्षित फल न मिलना मन को और अधिक व्यथित कर देता है। ऐसे दौर में बाहरी हलचल के साथ-साथ आंतरिक उथल-पुथल भी निरंतर चलती रहती है।
Struggle: बातों का शोर और मौन की पीड़ा
जब परिस्थितियाँ डगमगाती हैं, तब समाज में चर्चाओं और किंवदंतियों की बाढ़ आ जाती है। जो स्वयं कुछ रच नहीं पाते, वे शब्दों के सहारे अपने काल्पनिक विरोधियों से युद्ध छेड़ देते हैं। यह बतकही धीरे-धीरे कोडित रूप लेकर व्यापक हो जाती है और सत्य पीछे छूट जाता है। इस प्रक्रिया में तथाकथित न्याय और पक्षधरता का भ्रम भी पैदा होता है, जो अंततः विवेक को कुंद कर देता है।
Struggle: भक्ति, भावुकता और विवेक का संकट
इतिहास और साहित्य हमें यह भी सिखाते हैं कि भावनात्मक करुणा और आत्मविलाप हमेशा रचनात्मक नहीं होते।
सूरदास और वल्लभाचार्य का प्रसंग इसी द्वंद्व को उजागर करता है।
आज स्थिति यह है कि आत्मालोचन की जगह भावुक उद्धरणों का शोर बढ़ गया है।
श्रोता आनंदित तो होते हैं, पर विवेक शून्य होता चला जाता है।
यह प्रवृत्ति चिंताजनक है, क्योंकि इससे बौद्धिक अनुशासन कमजोर पड़ता है।
आत्ममंथन की आवश्यकता
नए वर्ष में लेखन की ओर लौटने का संकल्प आत्मचिंतन से जुड़ा है।
एक विचारक मित्र का प्रश्न—कि यदि आस्था से पहले संस्थानों को सुधारने की बात कही जाए तो क्या समाज सुनेगा—आज भी मन में गूंजता है।
यह प्रश्न हमारे विद्यालयों, न्यायालयों और चिकित्सालयों की स्थिति पर सीधा प्रहार करता है।
महान संकल्पों के बीच यदि हम बौद्धिक ईमानदारी, तर्कशीलता और प्रतिबद्धता को खो देंगे, तो ज्ञान-परंपरा का क्षरण तय है।
ज्ञान-परंपरा और जिम्मेदारी
जहाँ अध्ययन, विचार और सृजन की जगह चापलूसी और उदासीनता ले ले, वहाँ भविष्य अंधकारमय होता है।
आत्ममंथन को केवल भावात्मक कथन बनने से रोकना होगा। यही समय की पुकार है—कि हम शोर से बाहर निकलकर विवेक, कर्म और उत्तरदायित्व की ओर लौटें।
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