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by-Ravindra Sikarwar

देहरादून: उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र के चकराता ब्लॉक में बसे कंदाड़ गांव की पंचायत ने महिलाओं के सोने के आभूषणों पर कड़ा अंकुश लगाते हुए एक अनोखा नियम पारित किया है। गांववालों की सर्वसम्मति से बने इस फैसले के तहत, शादियों, पारिवारिक समारोहों और अन्य सार्वजनिक आयोजनों में महिलाएं केवल तीन सोने के गहने ही पहन सकेंगी। इनमें विवाह सूत्र (मंगलसूत्र), नथ या नाक की बाली (फूली) और कान की बालियां (बुंदे) शामिल हैं। यदि कोई महिला इससे अधिक गहने धारण करती पाई जाती है, तो उसे 50,000 रुपये का भारी जुर्माना भरना पड़ेगा। यह निर्णय सोने की बढ़ती कीमतों के बीच सामाजिक दबाव को कम करने और आर्थिक असमानता दूर करने के उद्देश्य से लिया गया है।

गांव की पृष्ठभूमि: जौनसार-बावर का आदिवासी इलाका
कंदाड़ गांव उत्तराखंड के देहरादून जिले के चकराता तहसील में स्थित एक छोटा-सा आदिवासी बस्ती है, जो जौनसार-बावर पर्वतीय क्षेत्र का हिस्सा है। यह क्षेत्र अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं, घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यहां की अधिकांश आबादी जौनसारी जनजाति से संबंधित है, जो पॉलीएंड्री (एक स्त्री के एकाधिक पति) जैसी प्राचीन रीतियों के लिए प्रसिद्ध रही है। गांव की आबादी लगभग 500-600 के आसपास है, और अधिकतर लोग कृषि, पशुपालन और वन उत्पादों पर निर्भर हैं। हाल के वर्षों में कुछ युवाओं को सरकारी नौकरियां मिलने से आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ, लेकिन इससे सामाजिक दिखावे की प्रवृत्ति भी बढ़ी। गांव की पंचायत, जो स्थानीय स्तर पर ‘स्वशासन’ का प्रतीक है, ने इस समस्या से निपटने के लिए यह कदम उठाया।

नियम का पूरा विवरण: तीन गहनों की सीमा और जुर्माने का प्रावधान
पंचायत की बैठक में लिए गए इस फैसले को ‘सादगी और समानता का संकल्प’ नाम दिया गया है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • निगरानी: गांव के बुजुर्गों और महिला समूहों की एक कमिटी गठित की गई है, जो आयोजनों के दौरान नजर रखेगी।
  • अनुमत गहने: केवल तीन प्रकार के सोने के आभूषण – मंगलसूत्र (विवाहित महिलाओं का पारंपरिक हार), फूली (नाक में पहनी जाने वाली बाली या स्टड) और बुंदे (कान की बालियां)। ये गहने सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के हैं, जो महिलाओं की वैवाहिक स्थिति को दर्शाते हैं।
  • लागू क्षेत्र: यह नियम विशेष रूप से शादियों, जन्मोत्सव, त्योहारों और अन्य सामुदायिक आयोजनों पर लागू होगा। दैनिक जीवन या निजी समारोहों में कोई पाबंदी नहीं।
  • जुर्माना: उल्लंघन पर तत्काल 50,000 रुपये का दंड। यह राशि गांव के सामुदायिक कोष में जमा होगी, जो विकास कार्यों में उपयोग होगी। पंचायत ने स्पष्ट किया कि जुर्माना सामूहिक रूप से वसूला जाएगा, यदि कोई महिला इसे न चुका सके।

यह नियम केवल विवाहित महिलाओं पर केंद्रित है, लेकिन अविवाहित लड़कियों के लिए भी सादगी की अपील की गई है।

कारण: सोने की महंगाई और सामाजिक दबाव की मार
यह फैसला सोने की रिकॉर्ड कीमतों के बीच लिया गया, जहां एक ग्राम सोने की कीमत 7,500 रुपये से ऊपर पहुंच चुकी है। पिछले 15-20 वर्षों में गांव में कुछ परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी, जिससे महिलाएं शादियों में 180-200 ग्राम तक के भारी डिजाइनर गहने पहनने लगीं। ऐसे सेटों की कीमत अब 22-25 लाख रुपये तक हो गई है, जो गरीब परिवारों पर बोझ बन रहा है। पंचायत के सरपंच हरि सिंह ने कहा, “दिखावे की होड़ से परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। यह नियम समानता लाएगा और सच्ची खुशी को बढ़ावा देगा।” गांववासी बताते हैं कि पहले सादगी प्रचलित थी, लेकिन नौकरियों और शहरों के प्रभाव से यह बदलाव आया। महिलाओं ने भी समर्थन किया, क्योंकि कई ने बताया कि महंगे गहनों की चिंता शादी का मजा खराब कर देती है।

गांववालों की प्रतिक्रिया: समर्थन और कुछ असंतोष

  • समर्थन: अधिकांश महिलाओं और युवाओं ने फैसले का स्वागत किया। एक स्थानीय महिला रीता देवी ने कहा, “अब हम बिना तनाव के उत्सव मना सकेंगी।” पंचायत का दावा है कि 90% से अधिक लोग सहमत हैं।
  • विरोध: कुछ बुजुर्ग महिलाओं ने इसे ‘पुरानी परंपराओं का अपमान’ बताया, क्योंकि जौनसारी संस्कृति में भारी आभूषण सौंदर्य का प्रतीक हैं। एक युवा ने चिंता जताई कि यह महिलाओं की आजादी पर अंकुश लगाएगा।
  • समानता की मांग: महिलाओं ने पंचायत से महंगे ब्रांडेड शराब पर भी प्रतिबंध लगाने की अपील की, क्योंकि पुरुषों पर भी दिखावे का दबाव है।

जौनसार-बावर की सांस्कृतिक परंपराएं: आभूषणों का महत्व
जौनसार क्षेत्र की महिलाएं पारंपरिक रूप से सोने-चांदी के आभूषणों से सजती हैं, जो उनकी सामाजिक स्थिति दर्शाते हैं। यहां की प्रसिद्ध ज्वेलरी में नथुली (बड़ी नाक की अंगूठी), गलोबंद (गले का हार), चर्यू (मोती वाली माला) और पौंची (बाजूबंद) शामिल हैं। ये गहने शादियों और त्योहारों में अनिवार्य माने जाते हैं, लेकिन आधुनिकता ने इन्हें महंगा बना दिया। पंचायत का यह नियम स्थानीय रीति को बनाए रखते हुए आर्थिक बोझ कम करने का प्रयास है।

प्रशासनिक और कानूनी पहलू: क्या होगा आगे?
उत्तराखंड सरकार ने इस फैसले को ‘सामुदायिक पहल’ मानते हुए हस्तक्षेप न करने का संकेत दिया है, लेकिन महिला आयोग ने निगरानी रखने का आश्वासन दिया। यदि कोई शिकायत मिलती है, तो पंचायती राज एक्ट के तहत जांच होगी। विशेषज्ञों का मत है कि यह नियम लैंगिक समानता को बढ़ावा दे सकता है, यदि पुरुषों पर भी लागू हो। गांव ने इसे ‘स्वशासन का उदाहरण’ बताते हुए अन्य क्षेत्रों के लिए मॉडल बनाने की बात कही।

यह घटना उत्तराखंड के ग्रामीण समाज में बदलते मूल्यों को दर्शाती है, जहां परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष जारी है। पंचायत का अगला कदम सामुदायिक जागरूकता अभियान होगा। अधिक अपडेट्स के लिए स्थानीय समाचार स्रोतों का सहारा लें।

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