by-Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में स्थित सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट (UMPP) भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभर रहा है। यह 3,960 मेगावाट क्षमता वाला थर्मल पावर प्लांट एशिया का सबसे बड़ा एकीकृत कोयला-आधारित संयंत्र है, जो न केवल राष्ट्रीय बिजली ग्रिड को ऊर्जा प्रदान कर रहा है, बल्कि सतत विकास की दिशा में भी योगदान दे रहा है। सुपरक्रिटिकल तकनीक के उपयोग से यह संयंत्र दक्षता बढ़ाने और उत्सर्जन कम करने में सक्षम है, जो भारत की नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण की बहसों के बीच कोयले के सतत उपयोग पर केंद्रित है। रिलायंस पावर लिमिटेड द्वारा संचालित यह प्रोजेक्ट सात राज्यों को सस्ती और विश्वसनीय बिजली उपलब्ध करा रहा है, जो करोड़ों लोगों की दैनिक जरूरतों को पूरा करता है।
सासन UMPP की स्थापना 2007 में शुरू हुई, जब भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट्स की योजना बनाई। यह योजना 4,000 मेगावाट या इससे अधिक क्षमता वाले संयंत्रों पर आधारित थी, ताकि बिजली उत्पादन में कमी को पूरा किया जा सके। सासन प्रोजेक्ट को 2010 में रिलायंस पावर को आवंटित किया गया, और इसका निर्माण 2013 में पहली इकाई के सिंक्रोनाइजेशन के साथ तेजी पकड़ी। कुल छह इकाइयों में से प्रत्येक 660 मेगावाट की है, जो शंघाई इलेक्ट्रिक से प्राप्त उपकरणों पर आधारित हैं। पहली इकाई मार्च 2013 में चालू हुई, और अंतिम इकाई मार्च 2015 तक पूरी हो गई। यह भारत का पहला एकीकृत कोयला खदान और सुपरक्रिटिकल पावर प्लांट है, जो पिट-हेड लोकेशन पर स्थित होने से परिवहन लागत को न्यूनतम रखता है।
तकनीकी रूप से, यह संयंत्र सुपरक्रिटिकल तकनीक का उपयोग करता है, जो पारंपरिक सबक्रिटिकल प्लांट्स की तुलना में 10-15% अधिक दक्ष होता है। इससे ईंधन की खपत कम होती है और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आती है। एकीकृत कोयला खदानों—मोहर-अम्लोहरी एक्सटेंशन, मोहर-अम्लोहरी और छत्रसाल—के माध्यम से सालाना 20 मिलियन टन कोयला उत्पादन होता है, जिसकी कुल रिजर्व 750 मिलियन टन से अधिक है। ये खदानें सिंगरौली क्षेत्र में ही स्थित हैं, जो कोयला उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। प्रोजेक्ट की कुल निवेश लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये रही, जिसमें बिजली उत्पादन के साथ-साथ खनन सुविधाएं शामिल हैं। यह संयंत्र 25 वर्षों के लिए सात राज्यों—मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तराखंड—को बिजली सप्लाई करता है, जो 42 करोड़ से अधिक आबादी को लाभ पहुंचाता है।
सतत कोयला उपयोग और नवीकरणीय तत्वों के एकीकरण के संदर्भ में सासन UMPP एक मिश्रित छवि पेश करता है। सुपरक्रिटिकल तकनीक से उत्सर्जन में कमी के बावजूद, 2018 में यह दुनिया के दस सबसे प्रदूषणकारी कोयला संयंत्रों में शामिल था, जहां सालाना 27.2 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन दर्ज किया गया। हालांकि, रिलायंस पावर ने पर्यावरणीय उपायों पर जोर दिया है, जैसे फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम की स्थापना, जो सल्फर डाइऑक्साइड को 90% तक कम करता है। नवीकरणीय एकीकरण के प्रयासों में, संयंत्र के आसपास सौर ऊर्जा वॉशिंग सिस्टम और बायोमास कोयला मिश्रण की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जो भारत की 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय क्षमता के लक्ष्य से जुड़ती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संयंत्र कोयले को ‘क्लीन कोल’ तकनीक से सतत बनाने में पुल का काम कर सकते हैं, जहां कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) जैसी तकनीकों का उपयोग भविष्य में बढ़ेगा।
आर्थिक रूप से, सासन UMPP ने सिंगरौली क्षेत्र को एक औद्योगिक केंद्र बना दिया है। यह हजारों नौकरियां पैदा करता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देता है, लेकिन पर्यावरणीय चुनौतियां भी साथ लाया है। विस्थापन, जल प्रदूषण और वन कटाई जैसे मुद्दों पर विवाद रहे हैं, जहां स्थानीय समुदायों ने मुआवजे और पुनर्वास की मांग की। फिर भी, संयंत्र की उच्च प्लांट लोड फैक्टर (PLF)—2021-22 में 80% से अधिक—ने इसकी विश्वसनीयता साबित की है। भारत की ऊर्जा नीति में, जहां कोयला अभी भी 70% बिजली उत्पादन का आधार है, सासन जैसे प्रोजेक्ट संक्रमणकालीन भूमिका निभा रहे हैं। सरकार की ‘नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ और सौर-कोयला हाइब्रिड मॉडल्स के साथ इसका एकीकरण भविष्य की दिशा तय कर सकता है।
कुल मिलाकर, सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह न केवल वर्तमान जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि सतत विकास की ओर एक संतुलित कदम भी है। जैसे-जैसे देश नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दे रहा है, ऐसे संयंत्रों को अनुकूलित करने की आवश्यकता बढ़ रही है, ताकि पर्यावरण और विकास का सामंजस्य स्थापित हो सके।
