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By: Ravindra Sikarwar

देशभर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जहां “एक पेड़, मां के नाम” जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई के फैसले इन प्रयासों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले से ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां कोल ब्लॉक आवंटन के तहत हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगलों को साफ करने की तैयारी से स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।

सिंगरौली, जिसे प्रदेश की ऊर्जाधानी कहा जाता है, वहां अहमदाबाद की कंपनी मेसर्स स्ट्रैटाटेक मिनरल प्राइवेट लिमिटेड को कोल ब्लॉक के लिए कुल 1397.54 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई है। इसमें 1335.35 हेक्टेयर वन भूमि और 62.19 हेक्टेयर राजस्व भूमि शामिल है। यह इलाका घने जंगलों से आच्छादित है, जहां वर्षों से प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका भी जुड़ी हुई है।

लाखों पेड़ों पर संकट
इस कोल ब्लॉक परियोजना के तहत अनुमान है कि करीब 5 लाख 70 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई की जाएगी। पहले चरण में 345 हेक्टेयर क्षेत्र को चिन्हित किया गया है, जिसमें से फिलहाल 72 हेक्टेयर इलाके में काम शुरू हो चुका है। अब तक लगभग 33 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं। इस फैसले से न सिर्फ पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है, बल्कि आसपास के गांवों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी पर भी संकट गहराता दिख रहा है।

बासी, बेरदह, घिरौली, आमडाड़ और अमराईखोह जैसे गांव इस परियोजना से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल ही उनकी आजीविका का मुख्य साधन है—चाहे वह जलावन लकड़ी हो, तेंदूपत्ता संग्रह हो या फिर अन्य वन उत्पाद। जंगल कटने से न केवल रोजगार छीने जाएंगे, बल्कि क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ जाएगा।

विरोध और राजनीति
कोल ब्लॉक आवंटन के खिलाफ स्थानीय लोगों का विरोध लगातार तेज हो रहा है। इस मुद्दे को राजनीतिक रंग भी मिलने लगा है। कांग्रेस पार्टी ने इसे सरकार की कथनी और करनी के बीच का अंतर बताते हुए आरोप लगाए हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 12 सदस्यीय तथ्य-खोज समिति का गठन कर इस पूरे मामले की जांच की घोषणा की है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि एक तरफ सरकार मां के नाम पौधे लगाने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ कंपनियों के हित में लगे-लगाए जंगलों को कटवाया जा रहा है।

पहले भी हो चुका है रद्द
यह पहली बार नहीं है जब सिंगरौली में कोल ब्लॉक को लेकर विवाद खड़ा हुआ हो। इससे पहले भी इसी क्षेत्र में कोल ब्लॉक आवंटन का फैसला लिया गया था, लेकिन जब स्थानीय स्तर पर व्यापक विरोध हुआ, तो उस आवंटन को रद्द करना पड़ा था। इस बार स्थिति अलग बताई जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि अब कंपनी का काम पुलिस सुरक्षा के बीच कराया जा रहा है। परियोजना क्षेत्र के प्रवेश बिंदुओं पर पुलिस तैनात है और आने-जाने वालों की सघन जांच की जा रही है, जिससे क्षेत्र में भय और असंतोष का माहौल है।

सरकार का पक्ष
वहीं, सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि सभी कार्य नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत किए जा रहे हैं। राज्य मंत्री (वन) दिलीप अहिस्वार ने कहा है कि पेड़ों की कटाई के लिए विधिवत अनुमति ली गई है और इसके बदले क्षतिपूर्ति वनीकरण की व्यवस्था भी की गई है। उनके अनुसार, आवंटित संस्था द्वारा करीब 98 करोड़ 70 लाख रुपये से अधिक की राशि क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए जमा कराई गई है, जिसके तहत गैर-वन भूमि पर लगभग 13 लाख 97 हजार पौधे लगाए जाएंगे।

पर्यावरण बनाम विकास की बहस
सिंगरौली का यह मामला एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को सामने ले आया है। एक ओर ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक विकास की जरूरतें हैं, तो दूसरी ओर जंगल, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों का भविष्य। सवाल यह है कि क्या विकास की कीमत प्रकृति और लोगों की आजीविका से चुकाई जानी चाहिए, या फिर ऐसे वैकल्पिक रास्ते खोजे जाने चाहिए जो पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाएं।

फिलहाल, कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर सिंगरौली में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार, कंपनी और स्थानीय लोगों के बीच कोई संतुलित समाधान निकल पाता है या नहीं।

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