By: Ravindra Sikarwar
उज्जैन, मध्य प्रदेश: स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही के मामले अक्सर सुर्खियां बनते हैं, लेकिन उज्जैन जिले से सामने आया यह प्रकरण बेहद स्तब्ध करने वाला है। यहां एक गर्भवती महिला के साथ ऐसा हुआ कि उसका गर्भस्थ शिशु मर चुका था, फिर भी डॉक्टर ने उसे पूरी तरह से स्वस्थ बताकर इलाज जारी रखा। परिणामस्वरूप, महिला को गंभीर संक्रमण हो गया और उसकी जान पर बन आई। यह घटना न केवल चिकित्सकीय नैतिकता पर सवाल उठाती है, बल्कि मरीजों के विश्वास को भी झकझोरती है। परिवार ने डॉक्टर की इस गलती पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सार्वजनिक रूप से विरोध प्रदर्शन किया। आइए, इस पूरे मामले की विस्तार से पड़ताल करें।
यह घटना उज्जैन शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित दताना गांव की है। यहां रहने वाले साहिल पटेल की पत्नी मुस्कान पटेल गर्भवती थीं। गर्भावस्था की शुरुआत से ही वे स्थानीय डॉक्टर रुपाली महेश्वरी के पास इलाज करवा रही थीं। डॉक्टर रुपाली पुष्पा मिशन अस्पताल में कार्यरत हैं और उनका अपना क्लिनिक भी है। मुस्कान की गर्भावस्था सामान्य रूप से चल रही थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, कुछ अनहोनी होने लगी। जब मुस्कान छह महीने की गर्भवती हुईं, तो डॉक्टर ने सोनोग्राफी करवाई। रिपोर्ट में सब कुछ ठीक बताया गया और जच्चा-बच्चा दोनों को स्वस्थ घोषित किया गया। डॉक्टर ने कहा कि डेढ़ महीने बाद दोबारा जांच करवाएं।
समय बीता और डेढ़ महीने बाद, यानी 14 नवंबर को मुस्कान ने दोबारा सोनोग्राफी करवाई। रिपोर्ट लेकर वे डॉक्टर रुपाली के पास पहुंचीं। हैरानी की बात यह है कि सोनोग्राफी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से लिखा था कि गर्भ में पल रहे शिशु की धड़कन बंद हो चुकी है, यानी उसकी मौत हो गई है। लेकिन डॉक्टर ने रिपोर्ट को ठीक से न पढ़ा या अनदेखा किया और मुस्कान को आश्वासन दिया कि सब कुछ सामान्य है। उन्होंने 14 दिनों की दवाइयां लिख दीं और कहा कि बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ है। मुस्कान और उनके परिवार ने डॉक्टर की बात पर भरोसा किया और घर लौट आए। लेकिन अगले दिनों में मुस्कान को असहनीय दर्द होने लगा। गर्भ में कोई हलचल महसूस नहीं हो रही थी, जो एक सामान्य गर्भावस्था में होना चाहिए। दर्द बढ़ता गया, लेकिन वे डॉक्टर की सलाह पर दवाइयां लेती रहीं।
करीब दो सप्ताह तक यह सिलसिला चलता रहा। मुस्कान की हालत बिगड़ती गई। पेट में दर्द असहनीय हो गया और संक्रमण के लक्षण दिखने लगे। परिवार चिंतित हो गया और 29 नवंबर को उन्होंने दोबारा सोनोग्राफी करवाई। इस बार वे किसी अन्य डॉक्टर के पास गए। नई रिपोर्ट और पुरानी रिपोर्ट देखकर डॉक्टर हैरान रह गए। उन्होंने परिवार को बताया कि शिशु की मौत तो 14 नवंबर को ही हो चुकी थी। रिपोर्ट में साफ-साफ उल्लेख था कि धड़कन बंद है और शिशु जीवित नहीं है। लेकिन डॉक्टर रुपाली ने इस पर ध्यान नहीं दिया और इलाज जारी रखा। इस लापरवाही के कारण मुस्कान के गर्भ में मृत शिशु 15 दिनों तक रहा, जिससे संक्रमण फैल गया। संक्रमण इतना गंभीर हो गया कि मुस्कान की जान पर खतरा मंडराने लगा। आनन-फानन में उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां सर्जरी के माध्यम से मृत शिशु को निकाला गया। शुक्र है कि मुस्कान की जान बच गई, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने परिवार को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ दिया।
घटना के बाद साहिल पटेल ने डॉक्टर रुपाली को फोन किया और अपनी नाराजगी जताई। डॉक्टर ने गलती स्वीकार की और कहा कि रिपोर्ट के अक्षर छोटे थे, इसलिए वे ठीक से पढ़ नहीं पाईं। उन्होंने माफी मांगी, लेकिन यह माफी परिवार के घावों पर मरहम नहीं लगा सकी। साहिल ने इलाज में खर्च हुए पैसे की मांग की, लेकिन डॉक्टर ने उन्हें धमकाकर भगा दिया। इससे आहत होकर साहिल ने अपने रिश्तेदारों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन किया। वे पुष्पा मिशन अस्पताल पहुंचे, जहां हाथों में बैनर लेकर खड़े हो गए। बैनर पर लिखा था कि यह ‘मौत का अस्पताल’ है और लोग यहां इलाज न करवाएं। इसके बाद वे डॉक्टर रुपाली के दशहरा मैदान स्थित निजी क्लिनिक ‘आराध्य हेल्थ केयर’ पहुंचे। वहां भी उन्होंने बैनर दिखाकर लोगों को चेतावनी दी कि यह ‘मौत की डॉक्टर’ है और इससे इलाज न करवाएं। इस प्रदर्शन से इलाके में हलचल मच गई और लोग चिकित्सकीय लापरवाही पर चर्चा करने लगे।
यह मामला चिकित्सा जगत में व्याप्त लापरवाही का एक जीता-जागता उदाहरण है। गर्भावस्था जैसी संवेदनशील स्थिति में रिपोर्ट को ठीक से न पढ़ना या अनदेखा करना न केवल अपराध है, बल्कि मरीज की जान से खिलवाड़ है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सोनोग्राफी रिपोर्ट को सावधानी से जांचना डॉक्टर की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि समय पर सही कदम उठाया जाता, तो मुस्कान को इतनी पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती और संक्रमण से बचाव हो जाता। परिवार अब न्याय की मांग कर रहा है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन और चिकित्सा परिषद से डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की अपील की है। इस घटना से सबक लेते हुए मरीजों को सलाह दी जाती है कि वे हमेशा दूसरी राय लें, खासकर गंभीर मामलों में। उज्जैन जैसे शहरों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, ऐसी लापरवाही और भी खतरनाक साबित हो सकती है। उम्मीद है कि इस प्रकरण की जांच होगी और दोषी को सजा मिलेगी, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं।
