by-Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के दमोह जिले में दुर्गा पूजा के दौरान आयोजित एक शस्त्र पूजा समारोह ने विवाद को जन्म दिया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP), बजरंग दल और मातृ शक्ति संगठन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने तलवारें, कुल्हाड़ियां और अन्य हथियारों की पूजा की और उन्हें प्रदर्शित किया। इस आयोजन ने स्थानीय स्तर पर तीखी बहस छेड़ दी है, जिसमें आलोचकों ने उत्सव के माहौल में हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।
शस्त्र पूजा समारोह का आयोजन:
दमोह में दुर्गा पूजा के अवसर पर आयोजित इस शस्त्र पूजा समारोह में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने परंपरागत रूप से शस्त्रों की पूजा की, जो हिंदू धर्म में शक्ति और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में मानी जाती है। इस समारोह में तलवारें, कुल्हाड़ियां और अन्य पारंपरिक हथियारों को सजाकर उनकी पूजा की गई। आयोजकों का कहना है कि यह समारोह धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा है, जो नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा की शक्ति का सम्मान करता है।
मातृ शक्ति संगठन की महिला कार्यकर्ताओं ने भी इस आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने हथियारों को प्रदर्शित करते हुए नारे लगाए और धार्मिक भजनों का गायन किया। आयोजकों ने इसे आत्मरक्षा और सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा देने वाला कदम बताया।
विवाद का कारण:
हालांकि, इस आयोजन ने कई लोगों की भृकुटी चढ़ा दी। आलोचकों का कहना है कि धार्मिक उत्सव के दौरान हथियारों का प्रदर्शन हिंसा को बढ़ावा दे सकता है और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय बुद्धिजीवियों ने इस समारोह की आलोचना करते हुए कहा कि नवरात्रि जैसे पवित्र अवसर पर शस्त्रों का प्रदर्शन अनुचित है और यह समाज में गलत संदेश देता है।
कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की, जिसमें उन्होंने इसे “हिंसा की संस्कृति” को बढ़ावा देने वाला कदम बताया। एक स्थानीय निवासी ने ट्वीट किया, “दुर्गा पूजा शक्ति और भक्ति का उत्सव है, न कि हथियारों को बढ़ावा देने का। यह बच्चों और युवाओं के लिए गलत उदाहरण पेश करता है।”
आयोजकों का जवाब:
विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नेताओं ने इन आरोपों का खंडन किया है। उनका कहना है कि शस्त्र पूजा हिंदू धर्म की प्राचीन परंपरा है, जो माँ दुर्गा की शक्ति और रक्षा के प्रतीक को दर्शाती है। एक VHP नेता ने कहा, “हमारी परंपराएं हमें आत्मरक्षा और साहस सिखाती हैं। शस्त्र पूजा का उद्देश्य हिंसा को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि शक्ति और सुरक्षा का सम्मान करना है।”
मातृ शक्ति की एक कार्यकर्ता ने भी दावा किया कि यह आयोजन महिलाओं को आत्मरक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए था। उन्होंने कहा, “आज के समय में महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए सशक्त होना जरूरी है। यह समारोह हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।”
प्रशासन की प्रतिक्रिया:
दमोह जिला प्रशासन ने इस आयोजन पर नजर रखी थी और सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था की थी। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद स्थानीय पुलिस ने आयोजकों से बातचीत की और भविष्य में इस तरह के आयोजनों में सावधानी बरतने की सलाह दी। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम सभी धार्मिक आयोजनों का सम्मान करते हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है। हमने आयोजकों से शांति बनाए रखने की अपील की है।”
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस घटना ने स्थानीय स्तर पर राजनीतिक बहस को भी हवा दी है। विपक्षी दलों ने सत्तारूढ़ पार्टी पर इस तरह के आयोजनों को प्रोत्साहित करने का आरोप लगाया है। एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने कहा, “धार्मिक उत्सवों का उपयोग सामाजिक तनाव पैदा करने के लिए नहीं होना चाहिए। सरकार को इस तरह के आयोजनों पर नियंत्रण रखना चाहिए।”
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं ने इस समारोह का समर्थन करते हुए इसे सांस्कृतिक स्वतंत्रता का हिस्सा बताया। उन्होंने आलोचकों पर धार्मिक परंपराओं का अपमान करने का आरोप लगाया।
आगे की राह:
यह विवाद दमोह में सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलता को उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आयोजनों को लेकर समाज में संवाद की जरूरत है ताकि धार्मिक परंपराओं और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन बनाया जा सके। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि धार्मिक आयोजनों में हथियारों के प्रदर्शन को सीमित करने के लिए दिशानिर्देश बनाए जाएं।
फिलहाल, दमोह में स्थिति शांत है, लेकिन यह विवाद स्थानीय समुदाय में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह देखना बाकी है कि भविष्य में इस तरह के आयोजनों को लेकर प्रशासन और समाज क्या रुख अपनाता है।
