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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: सऊदी अरब ने अपनी 50 वर्ष पुरानी कफाला (स्पॉन्सरशिप) प्रणाली को पूरी तरह समाप्त करने का फैसला लिया है, जो प्रवासी मजदूरों के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव है। जून 2025 में घोषित इस सुधार से देश में रहने वाले करीब 1.3 करोड़ विदेशी श्रमिकों को लाभ मिलेगा, जो मुख्य रूप से दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से आते हैं। यह प्रणाली लंबे समय से मानवाधिकार संगठनों द्वारा ‘आधुनिक गुलामी’ के रूप में आलोचना का शिकार रही थी, क्योंकि इसमें नियोक्ताओं को मजदूरों पर अत्यधिक नियंत्रण प्राप्त था। अब इसे अनुबंध-आधारित रोजगार मॉडल से बदल दिया गया है, जो मजदूरों को नौकरी बदलने, देश छोड़ने और कानूनी सहायता प्राप्त करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह बदलाव क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ‘विजन 2030’ का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त करना और वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करना है।

कफाला प्रणाली क्या थी? कफाला शब्द अरबी भाषा में ‘स्पॉन्सरशिप’ या ‘गारंटी’ का अर्थ रखता है। यह व्यवस्था 1950 के दशक में खाड़ी देशों में शुरू हुई थी, जब तेल की समृद्धि के कारण इन देशों को बड़ी संख्या में सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता पड़ी। सऊदी अरब में यह प्रणाली प्रवासी मजदूरों के कानूनी दर्जे को उनके नियोक्ता (कफील) से जोड़ती थी। मजदूरों का वीजा, निवास परमिट और रोजगार पूरी तरह कफील पर निर्भर होता था। कफील कोई व्यक्ति या कंपनी हो सकता था, जो मजदूर की पूरी जिम्मेदारी लेता था, लेकिन इससे नियोक्ता को मजदूरों पर असीमित शक्ति मिल जाती थी। मजदूर बिना कफील की अनुमति के नौकरी नहीं बदल सकते थे, देश नहीं छोड़ सकते थे और यहां तक कि कानूनी शिकायत भी दर्ज नहीं करा सकते थे। इसका उद्देश्य राज्य की नौकरशाही को बोझ से बचाना था, लेकिन समय के साथ यह दुरुपयोग का माध्यम बन गई।

इस प्रणाली की आलोचना क्यों हुई? कफाला व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘आधुनिक गुलामी’ का नाम दिया गया, क्योंकि यह नियोक्ता और मजदूर के बीच असमानता पैदा करती थी। मानवाधिकार संगठन जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने इसे मानव तस्करी को बढ़ावा देने वाला बताया। मजदूरों से पासपोर्ट छीन लिए जाते थे, उन्हें कम वेतन दिया जाता था या वेतन रोका जाता था, और शारीरिक या यौन शोषण के मामले आम थे। महिलाओं, विशेष रूप से घरेलू सहायिकाओं, को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा। उदाहरण के लिए, 2017 में गुजरात और कर्नाटक की महिलाओं के साथ हुए शोषण के मामले सामने आए, जहां उन्हें यौन दासता में धकेला गया या शारीरिक हिंसा का शिकार बनाया गया। मजदूर बिना अनुमति के नौकरी छोड़ने पर ‘अवैध निवासी’ घोषित हो जाते थे और गिरफ्तारी या निर्वासन का खतरा रहता था। खाड़ी देशों में कुल 2.5 करोड़ प्रवासी मजदूरों में से 75 लाख भारतीय थे, जो इस प्रणाली से प्रभावित थे।

समाप्ति के पीछे के कारण और विवरण: सऊदी अरब ने जून 2025 में इस प्रणाली को समाप्त करने की घोषणा की, जो विजन 2030 का हिस्सा है। इस योजना का लक्ष्य अर्थव्यवस्था को विविध बनाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और देश की छवि सुधारना है। अंतरराष्ट्रीय दबाव, जैसे कतर में 2022 फीफा विश्व कप से पहले हुए सुधार, ने भी भूमिका निभाई। अब कफाला की जगह अनुबंध-आधारित व्यवस्था आई है, जहां मजदूरों को कफील की अनुमति के बिना नौकरी बदलने, एक्जिट वीजा के बिना देश छोड़ने और श्रम अदालतों में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार मिला है। यह सुधार 2029 एशियाई शीतकालीन खेलों से पहले देश की वैश्विक छवि मजबूत करने का प्रयास है।

प्रवासी मजदूरों को होने वाले फायदे: इस बदलाव से सऊदी अरब में रहने वाले 1.3 करोड़ मजदूरों को स्वतंत्रता मिलेगी। वे अब नियोक्ता की मर्जी के बिना नौकरी बदल सकेंगे, जिससे शोषण कम होगा और बेहतर वेतन की बातचीत संभव होगी। देश छोड़ने के लिए एक्जिट वीजा की जरूरत नहीं पड़ेगी, जो परिवार की आपात स्थिति में उपयोगी होगा। कानूनी सुरक्षा बढ़ेगी, जहां मजदूर शोषण की शिकायत आसानी से कर सकेंगे। विशेष रूप से भारतीयों (करीब 25 लाख) और बांग्लादेशियों (2023 में 4.98 लाख नए मजदूर) को फायदा होगा, जो निर्माण, घरेलू कार्य और कृषि क्षेत्रों में कार्यरत हैं। महिलाओं को शोषण से मुक्ति मिलेगी। कुल मिलाकर, यह सुधार मजदूरों की गरिमा और आर्थिक भागीदारी बढ़ाएगा, हालांकि मानवाधिकार संगठन इसकी प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रख रहे हैं।

यह सुधार सऊदी अरब को वैश्विक श्रम मानकों के करीब लाता है और प्रवासी मजदूरों के लिए एक नई शुरुआत का संकेत देता है। हालांकि, वास्तविक बदलाव के लिए सख्त निगरानी और क्रियान्वयन आवश्यक है।

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