By: Ravindra Sikarwar
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय सभ्यता, हिंदू समाज की भूमिका और देश की आर्थिक-सामरिक दिशा पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दुनिया की कई प्राचीन और समृद्ध सभ्यताएं समय की धारा में विलीन हो गईं, लेकिन भारत और इसकी सांस्कृतिक जड़ें आज भी मजबूती से कायम हैं। भागवत के अनुसार, इसका कारण हमारे समाज का वह आंतरिक ढांचा है जिसने सदियों के आक्रमण, संघर्ष और बदलावों के बावजूद अपनी मूल पहचान को सुरक्षित रखा। उनका कहना था कि हिंदू समाज केवल एक धार्मिक समुदाय नहीं, बल्कि ऐसी जीवन शैली का प्रतिनिधित्व करता है जो संपूर्ण मानवता के लिए सुरक्षा कवच जैसी भूमिका निभाती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक ‘अमर सभ्यता’ है, क्योंकि इसके मूल्य और कल्पनाशीलता समय के साथ नष्ट नहीं हुई, बल्कि और अधिक समृद्ध होती गई। भागवत ने कहा—अगर कभी हिंदू समाज ही समाप्त हो जाए, तो दुनिया की आत्मा भी खत्म हो जाएगी, क्योंकि मानवता को टिकाए रखने का आधार मूलतः भारतीय सभ्यता में ही निहित है।
भागवत ने अपने संबोधन में यह भी दोहराया कि भारत में रहने वाला कोई व्यक्ति पूरी तरह ‘गैर-हिंदू’ नहीं है, चाहे वह किसी धर्म का हो। उन्होंने कहा कि भारत के मुसलमान और ईसाई भी उसी प्राचीन वंश और संस्कृति से जुड़े हैं जो हिंदू समाज की जननी है। उनके अनुसार, धर्म बदलने से पूर्वज नहीं बदलते, और भारत में विविधता के बीच जो एकता दिखाई देती है, उसका मूल कारण यही साझा सांस्कृतिक आधार है। इस संदर्भ में उन्होंने सामाजिक उदाहरण देते हुए कहा कि विदेशी सभ्यताएं—जैसे यूनान, मिस्र या रोम—एक समय में विश्व की अग्रणी थीं, लेकिन आज उनके मूल रूप का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका है। जबकि भारत ने न सिर्फ खुद को बनाए रखा, बल्कि कई मुश्किल समय पार करने के बाद भी एक जीवंत और विकसित समाज के रूप में दुनिया के सामने खड़ा है।
भाषण के दौरान भागवत ने नक्सलवाद पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि समाज जब किसी समस्या के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा हो जाए, तो कोई भी उग्र विचारधारा अधिक समय तक टिक नहीं सकती। उन्होंने नक्सलवाद के कमजोर पड़ने को उदाहरण के तौर पर सामने रखा और कहा कि यह आंदोलन इसलिए ढह गया क्योंकि समाज ने यह तय कर लिया कि वह अब इसे और सहन नहीं करेगा। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का भी उल्लेख किया और कहा कि अंग्रेजी शासन दुनिया में सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से था, लेकिन भारत में उसके पतन की शुरुआत वहीं से हो गई जहां आम लोगों ने यह संकल्प किया कि आज़ादी से समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता की आवाज़ कभी शांत नहीं हुई—कभी वह धीमी पड़ी, कभी तेज हुई—but समाज ने उसे कभी मरने नहीं दिया। यही भारतीय समाज की आत्मा है, जो हर संकट के बाद और ज्यादा मजबूत होकर उभरती है।
अपने भाषण के अंतिम हिस्से में भागवत ने भारत की आर्थिक नीति, सैन्य तैयारी और राष्ट्र-निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी देश की मजबूती तभी संभव है जब उसकी अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर हो। उनके अनुसार, विदेशी सहायता या बाहरी निर्भरता के सहारे खड़े राष्ट्र अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकते। उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश को अपनी आर्थिक शक्ति के साथ शैक्षिक और सैन्य क्षमता भी बढ़ानी होगी। उनके अनुसार, राष्ट्र की ‘शक्ति’ का अर्थ केवल हथियार या सेना नहीं है—बल्कि आर्थिक क्षमता, तकनीकी ज्ञान, अनुसंधान, और आत्मनिर्भरता का संतुलित मिश्रण है। उन्होंने कहा कि यदि हम किसी अन्य देश पर व्यापार, तकनीक या संसाधनों के लिए निर्भर रहेंगे, तो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया कमजोर पड़ेगी। भागवत का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब भारत और अमेरिका के संबंध व्यापारिक तनावों से गुजर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर उच्च टैरिफ लगाए जाने के बाद दोनों देशों के रिश्ते प्रभावित हुए। इसके बाद भारत सरकार ने अपने ‘स्वदेशी’ अभियान और घरेलू उद्योग को मजबूत करने पर विशेष ध्यान देना शुरू किया।
