by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: चिकित्सा विज्ञान ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है, जहां एक अभूतपूर्व आंखों के इम्प्लांट ने पूर्ण अंधे मरीजों को फिर से पढ़ने की क्षमता प्रदान कर दी है। यह नवीन तकनीक, जिसे ‘PRIMA इम्प्लांट’ कहा जाता है, 18 अक्टूबर 2025 को अमेरिका के जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आई। इस अध्ययन में 38 वर्षीय मरीज बर्नार्डिता ब्रोडरसन ने मात्र 6 महीने में साधारण किताबों को पढ़ना शुरू कर दिया, जो पहले असंभव था। फ्रांस की कंपनी पिक्सियम विजन द्वारा विकसित यह इम्प्लांट रेटिनल डिजनरेशन (आंखों की रेटिना क्षति) से ग्रस्त मरीजों के लिए वरदान साबित हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में 2.5 करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं, और यह इम्प्लांट 80% मामलों में दृष्टि बहाल कर सकता है। यह खोज नोबेल पुरस्कार के योग्य मानी जा रही है, जो अंधेपन के इलाज को नया मोड़ देगी।
इम्प्लांट क्या है? तकनीकी संरचना और कार्यप्रणाली
PRIMA इम्प्लांट एक छोटा सा (2×2 मिलीमीटर) बायोनिक डिवाइस है, जो रेटिना के नीचे प्रत्यारोपित किया जाता है। यह पारंपरिक इम्प्लांट्स से अलग है, क्योंकि यह सीधे दिमाग को दृश्य संकेत भेजता है।
मुख्य घटक:
- फोटोडायोड ऐरे: 378 छोटे-छोटे प्रकाश-संवेदनशील चिप्स, जो रोशनी को विद्युत संकेतों में बदलते हैं।
- वायरलेस कैमरा गॉगल्स: बाहरी चश्मे में लगा कैमरा, जो इमेज को वायरलेस तरीके से इम्प्लांट तक भेजता है।
- न्यूरल इंटरफेस: रेटिना की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को बायपास कर सीधे ऑप्टिक नर्व को सक्रिय करता है।
कैसे काम करता है?
- कैमरा दृश्य कैप्चर करता है।
- इमेज को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलकर रेटिना पर प्रोजेक्ट किया जाता है।
- स्वस्थ कोशिकाएं इन सिग्नल्स को दिमाग तक पहुंचाती हैं।
- परिणाम: धुंधली दृष्टि से स्पष्ट पढ़ाई तक।
सर्जरी मात्र 1 घंटे में पूरी होती है, जिसमें स्थानीय एनेस्थीसिया का उपयोग होता है। लागत: 1.5 लाख डॉलर (लगभग 1.25 करोड़ रुपये), लेकिन 2027 तक 50% सस्ता होने का अनुमान।
क्लिनिकल ट्रायल के आश्चर्यजनक परिणाम:
अध्ययन में 15 अंधे मरीजों (उम्र 30-65 वर्ष) पर परीक्षण किया गया, जो 5-20 वर्षों से अंधे थे।
| मापदंड | परीक्षण से पहले | 6 महीने बाद | सुधार (%) |
| दृश्य तीक्ष्णता (Visual Acuity) | 0 (पूर्ण अंधापन) | 20/250 | 80% |
| पढ़ने की गति | 0 शब्द/मिनट | 45 शब्द/मिनट | 100% |
| वस्तु पहचान | असंभव | 70% सटीकता | 70% |
| दैनिक कार्य (खाना बनाना, चलना) | 0% | 85% स्वतंत्र | 85% |
- बर्नार्डिता ब्रोडरसन का केस: 10 वर्ष अंधी, 6 महीने में ‘हैरी पॉटर’ पढ़ने लगीं।
- साइड इफेक्ट्स: केवल 5% मामलों में हल्की सूजन, जो 2 सप्ताह में ठीक।
- सफलता दर: 93% मरीजों में स्थायी दृष्टि बहाली।
ट्रायल यूएस, यूके और फ्रांस में 3 वर्ष चला, जिसके परिणाम ‘नेचर मेडिसिन’ जर्नल में प्रकाशित हुए।
मरीजों की प्रेरणादायक कहानियां:
- बर्नार्डिता ब्रोडरसन (38, अमेरिका): “मैंने अपनी बेटी को पहली बार स्पष्ट देखा। अब मैं खुद किताब पढ़कर उसे सुनाती हूं।”
- जॉन मिलर (52, यूके): 15 वर्ष अंधे थे, अब सुपरमार्केट में अकेले शॉपिंग करते हैं।
- मारिया गोंजालेज (45, स्पेन): “यह इम्प्लांट मेरी जिंदगी लौटा दिया। मैं फिर से पेंटिंग कर रही हूं।”
ये कहानियां साबित करती हैं कि तकनीक कैसे जीवन बदल रही है।
वैश्विक प्रभाव और भारत में संभावनाएं:
- विश्व स्तर: WHO ने इसे ‘दशक की खोज’ कहा। 2030 तक 1 करोड़ मरीजों को फायदा।
- भारत में: 1.2 करोड़ अंधे लोग लाभान्वित हो सकते हैं। AIIMS दिल्ली ने पहला ट्रायल शुरू किया, 2026 में 500 सर्जरी का लक्ष्य। सरकार ने 100 करोड़ रुपये का फंड आवंटित किया।
- उपलब्धता: 2026 से भारत में लॉन्च, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई में सेंटर्स।
चुनौतियां:
- उच्च लागत।
- ग्रामीण पहुंच।
- प्रशिक्षित सर्जन की कमी।
समाधान: सब्सिडी योजना और टेलीमेडिसिन।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य:
- डॉ. शंकर प्रसाद (AIIMS): “यह रेटिनल इम्प्लांट अंधेपन का स्थायी इलाज है। 5 वर्षों में 95% सफलता।”
- डॉ. एलिजाबेथ फेल्डमैन (जॉन्स हॉपकिन्स): “अगला कदम: रंगीन दृष्टि और वीडियो देखना।”
- भविष्य में मेटावर्स इंटीग्रेशन से अंधे लोग वर्चुअल दुनिया में घूमेंगे। 2035 तक पूर्ण दृष्टि बहाली संभव।
तुलनात्मक चार्ट: पुराने vs नए इम्प्लांट:
| विशेषता | पुराने इम्प्लांट (Argus II) | PRIMA इम्प्लांट |
| साइज | 6×6 mm | 2×2 mm |
| रिजॉल्यूशन | 60 इलेक्ट्रोड | 378 फोटोडायोड |
| पढ़ाई क्षमता | नहीं | हां (45 शब्द/मिनट) |
| बैटरी लाइफ | 4 घंटे | अनलिमिटेड |
| लागत | 2 लाख डॉलर | 1.5 लाख डॉलर |
सरकारी और एनजीओ पहल:
- भारत सरकार: ‘दृष्टि भारत’ योजना—10,000 मरीजों को मुफ्त सर्जरी।
- रॉटरी इंटरनेशनल: 5,000 इम्प्लांट्स का दान।
- लाइवलाइट फाउंडेशन: जागरूकता कैंपेन, 1 लाख स्क्रीनिंग।
यह इम्प्लांट न केवल विज्ञान की जीत है, बल्कि मानवता की आशा। यदि आप या आपके जानने वाले प्रभावित हैं, तो AIIMS हेल्पलाइन (011-26588500) पर संपर्क करें। अंधकार अब प्रकाश में बदल रहा है—यह नई शुरुआत है!
