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By: Ravindra Sikarwar

मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वर्ष 2025-26 के लिए घरेलू प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण बैंकों (D-SIBs) की नई सूची जारी कर दी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ – देश के तीन सबसे बड़े निजी और सार्वजनिक बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक लगातार दसवें साल इस विशेष श्रेणी में बने हुए हैं। केंद्रीय बैंक ने इन बैंकों को “टू बिग टू फेल” (असफल होने पर अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाने वाले) मानते हुए इन पर अतिरिक्त पूंजी आवश्यकता, सख्त निगरानी और तनाव परीक्षण (stress test) जैसे कड़े नियम लागू रखे हैं।

आरबीआई ने मंगलवार शाम को जारी अधिसूचना में कहा कि ये तीनों बैंक 30 सितंबर 2025 तक के आंकड़ों के आधार पर चुने गए हैं। मूल्यांकन चार मुख्य मानदंडों – बैंक का आकार, आपस में जुड़ाव, जटिलता और प्रतिस्थापन की कमी – पर आधारित होता है। SBI को सबसे ऊंचे “बकेट-4” में रखा गया है, जबकि HDFC और ICICI “बकेट-3” में हैं। इसका मतलब है कि SBI को अपनी जोखिम-भारित संपत्ति (RWA) का अतिरिक्त 1 प्रतिशत पूंजी रखनी होगी, जबकि HDFC और ICICI को 0.80 प्रतिशत अतिरिक्त पूंजी रखने का नियम है। यह अतिरिक्त बफर पहले से लागू CET-1 पूंजी के ऊपर है।

क्यों हैं ये बैंक इतने महत्वपूर्ण?
वर्तमान में भारतीय बैंकिंग प्रणाली की कुल संपत्ति में इन तीनों का हिस्सा लगभग 42 प्रतिशत है। अकेले SBI की संपत्ति 72 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि HDFC बैंक 38 लाख करोड़ और ICICI बैंक 18 लाख करोड़ के पार है। यदि इनमें से कोई बैंक संकट में फंसता है, तो इसका असर पूरे वित्तीय तंत्र पर पड़ता है – कर्ज प्रवाह रुकता है, भुगतान प्रणाली प्रभावित होती है और अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ती है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद बेसल-III फ्रेमवर्क ने ऐसे बैंकों को D-SIB घोषित करने की व्यवस्था शुरू की थी, जिसे भारत ने 2015 से अपनाया।

इस बार क्या नया है?

  • आरबीआई ने पहली बार “बकेट-5” को खाली छोड़ा है, जो भविष्य में किसी बैंक के अत्यधिक बड़े होने पर इस्तेमाल होगा। वर्तमान में कोई बैंक इसके लिए योग्य नहीं है।
  • HDFC बैंक का विलय कॉर्पोरेशन बैंक के बाद भी उसका आकार इतना बढ़ा नहीं कि वह बकेट-4 में पहुंचे। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दो-तीन साल में यदि HDFC का बाजार हिस्सा और बढ़ा तो वह SBI के साथ बकेट-4 में आ सकता है।
  • सूची में कोई नया नाम नहीं जुड़ा। पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और एक्सिस बैंक पिछले कुछ सालों से इस दौड़ से बाहर हैं।

बैंकों पर क्या असर पड़ेगा?
अतिरिक्त पूंजी रखने से इन बैंकों का लाभांश वितरण और आक्रामक कर्ज वृद्धि पर कुछ अंकुश रहता है, लेकिन तीनों बैंक पहले से ही मजबूत पूंजी स्थिति में हैं। सितंबर 2025 तक SBI का CET-1 अनुपात 11.2%, HDFC का 18.9% और ICICI का 17.6% था, जो नियामकीय आवश्यकता से काफी ऊपर है। विश्लेषकों का कहना है कि इस घोषणा से शेयर बाजार में कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं होगा, क्योंकि यह अपेक्षित ही था।

आगे की राह
आरबीआई अब हर साल अगस्त-सितंबर में डेटा लेकर दिसंबर तक D-SIB सूची जारी करता है। अगले साल यदि कोई बैंक 2 प्रतिशत से अधिक बाजार हिस्सा बढ़ाता है या उसका आपस में जुड़ाव (interconnectedness) स्कोर बहुत ऊंचा जाता है, तो उसे भी इस सूची में शामिल किया जा सकता है। फिलहाल निजी क्षेत्र में कोटक महिंद्रा, एक्सिस और इंडसइंड बैंक निगरानी में हैं, लेकिन अभी वे सीमा से दूर हैं।

वित्तीय स्थिरता बोर्ड (FSB) के सदस्य के रूप में भारत इन बैंकों पर वैश्विक मानकों का भी पालन करता है। SBI को G-SIB (वैश्विक प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक) की सूची में कभी शामिल नहीं किया गया, लेकिन घरेलू स्तर पर उसकी भूमिका सबसे बड़ी है।

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने हाल ही में कहा था, “बड़े बैंकों का मजबूत होना अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है, लेकिन उनकी असफलता का जोखिम समाज पर नहीं डाला जा सकता।” यही वजह है कि D-SIB फ्रेमवर्क को और सख्त करने की तैयारी चल रही है – आने वाले समय में तनाव परीक्षण की आवृत्ति बढ़ाई जा सकती है और लिविंग विल (संकट में पुनर्गठन योजना) को और विस्तृत करना होगा।

कुल मिलाकर, यह घोषणा भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की मजबूती का प्रमाण है कि हमारे सबसे बड़े बैंक न केवल आकार में विशाल हैं, बल्कि नियामकीय दबाव झेलने के लिए भी पूरी तरह तैयार हैं। निवेशकों, जमाकर्ताओं और अर्थव्यवस्था के लिए यह एक आश्वासन है कि “टू बिग टू फेल” बैंक वास्तव में “टू सेफ टू फेल” बने रहें।

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