बांग्लादेश, जिस देश ने अपने जन्म के समय ही संघर्ष और बलिदान की विरासत अपने साथ लेकर दुनिया में कदम रखा था, एक बार फिर उथल-पुथल की आग में झुलस रहा है। ढाका की तंग गलियों से लेकर चटगाँव के व्यस्त बाज़ारों तक, हर तरफ बेचैनी, भय और अनिश्चितता की धुंध पसरी हुई है। सोमवार को इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ एक महत्वपूर्ण फैसले का दिन नज़दीक आता जा रहा है, और उसके साथ-साथ देश में हिंसा, विरोध, तनाव और राष्ट्रव्यापी “देश बंद” की घोषणाएँ तेज़ होती जा रही हैं। यह कोई अचानक उठा तूफ़ान नहीं है—यह कहानी पुराने राजनीतिक घावों, सत्ता के उतार-चढ़ाव, छात्र आंदोलनों, सरकारी दमन, गुस्से से भरे युवाओं, टूटते भरोसे और एक ऐसे मुकदमे की है जिसने पूरे देश को दो हिस्सों में बाँट दिया है। शेख हसीना, एक ऐसा नाम जो बांग्लादेश की राजनीति में चार दशक से ज़्यादा समय तक सबसे मज़बूत चेहरों में से रहा, आज एक ऐतिहासिक मुकदमे के केंद्र में खड़ी हैं—एक ऐसा मुकदमा जिसने देश की आत्मा को हिला दिया है। उन पर लगे आरोप मामूली नहीं हैं—पिछले साल ढाका में हुए छात्र-नेतृत्व वाले घातक विद्रोह से जुड़े मानवता के विरुद्ध अपराधों के गंभीर आरोप। अभियोजन पक्ष ने उनके लिए मृत्यु-दंड की मांग की है, और इस मांग ने बांग्लादेश को एक ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया है जहाँ हर मोड़ पर संघर्ष है, हर दिशा में शक है और हर कदम पर भय। भीड़ भरी यूनिवर्सिटी गलियों में, जहाँ कभी राजनीतिक नारों की जगह छात्र यूनियन के पोस्टर लगते थे, अब बैरिकेड्स और बख्तरबंद वाहन दिखाई देते हैं। देश की राजधानी ढाका में पुलिस और छात्रों के बीच टकराव बीते कई महीनों से जारी है। पिछले साल का वो विद्रोह, जिसने पूरा देश हिला दिया था, आज भी लोगों की स्मृतियों में जिंदा है—सैकड़ों घायल, कई मारे गए, और हजारों परिवार उस दर्द का बोझ ढो रहे हैं जो राजनीति के किसी भी आरोप-प्रत्यारोप से कहीं ऊपर है। शेख हसीना पर आरोप है कि उनके शासनकाल के दौरान विद्यार्थी संगठनों और विरोधी समूहों पर किये गए दमन में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हुआ। अभियोजकों के अनुसार, सरकारी आदेशों के चलते कई छात्र नेताओं को निशाना बनाया गया, कई स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक बनाए गये, और कई मौकों पर ऐसे कृत्य हुए जिन्हें ‘मानवता के विरुद्ध अपराध’ की श्रेणी में रखा गया। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल का गठन अपने आप में एक बहुत बड़ा विषय बन गया है—कई लोगों के लिए यह न्याय की दिशा में एक कदम है, लेकिन कुछ के लिए यह राजनीतिक टकराव का हथियार। इसी बीच विपक्षी पार्टियाँ लगातार यह आरोप लगाती रही हैं कि यह मुकदमा बदले की राजनीति का हिस्सा है। दूसरी ओर सरकारी समर्थक मानते हैं कि कानून सभी के लिए समान है, और अगर किसी ने अपराध किया है तो पद और प्रतिष्ठा उसे बचा नहीं सकते। यही विचारों का टकराव आज सड़कों पर हिंसा में बदल चुका है। ढाका यूनिवर्सिटी के पास रोज़ाना धुएँ का गुबार उठता है। कुछ छात्र तख्तियाँ लिए नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं—कुछ पुलिस की लाठी से बचते हुए भागते हैं—कुछ अपने घायल साथियों को उठाकर अस्पताल ले जाते हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते हैं—कुछ में पुलिस की गोलीबारी दिखती है, कुछ में भीड़ का हमला। हर वीडियो अपनी-अपनी कहानी कहता है, और हर कहानी भीड़ के गुस्से को और भड़काती है। इसी हिंसा के बीच, देश की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियनों और विपक्षी दलों ने “देश बंद” का ऐलान कर दिया है। बाजारों के शटर गिरते हैं, बसें रुक जाती हैं, ट्रेनें कम चलती हैं, लोग घरों में बंद हो जाते हैं। बांग्लादेश का आम नागरिक समझ नहीं पा रहा कि आने वाला समय कैसा होगा—क्योंकि हर तरफ सिर्फ एक ही सवाल है: फैसले के बाद क्या होगा? ट्रिब्यूनल के फैसले से ठीक पहले ढाका की हवा भारी हो चुकी है। देश इस बात के लिए तैयार हो रहा है कि फैसला चाहे जो भी आए—यह शांति नहीं बल्कि और बड़ी अशांति लेकर आएगा। अगर अदालत हसीना को दोषी ठहराती है, तो समर्थकों की प्रतिक्रिया भयानक हो सकती है; अगर अदालत उन्हें निर्दोष घोषित करती है, तो विरोध करने वालों का गुस्सा असहनीय रूप ले सकता है। यह वही बांग्लादेश है जिसने 1971 की आज़ादी का सपना कंधे पर उठाकर दुनिया को दिखाया कि संघर्ष कभी बेकार नहीं जाते; लेकिन वही देश आज अंधेरे मोड़ पर खड़ा है—जहाँ लोकतंत्र, विरोध, न्याय और सत्ता सब एक-दूसरे से उलझे हुए हैं। राजनीति के इस तूफ़ान में सबसे अधिक दर्द झेल रहा साधारण नागरिक—जो न तो अदालत के फैसलों का नियंत्रण रखता है, न ही राजनीति के इस अंधड़ का। लेकिन फिर भी उसे हर सुबह अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी जीने के लिए घर से निकलना होता है—डरते हुए कि कहीं कोई पत्थर उसकी बस पर न फेंक दिया जाए, कहीं कोई भीड़ उसकी राह न रोक ले, कहीं कोई गोली उसे निशाना न बना ले। इन सबके बीच शेख हसीना की कहानी भी किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं। एक वक्त में बांग्लादेश की सबसे ताकतवर महिला—तीस बार प्रधानमंत्री रहते हुए जिन्होंने देश की आर्थिक वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक पहचान बढ़ाई—अब अदालत में कठघरे में खड़ी हैं। हसीना जानती हैं कि यह मुकदमा सिर्फ न्याय का नहीं—बल्कि उनके राजनीतिक जीवन की विरासत का भी फैसला करेगा। उनकी पार्टी अब भी दावा करती है कि छात्र विद्रोह एक “संगठित राजनीतिक षड्यंत्र” था, जिसने देश को अस्थिर करने की कोशिश की, लेकिन ट्रिब्यूनल में प्रस्तुत सबूतों और गवाहों के बयान इस दावे को और जटिल बना देते हैं। दूसरी ओर विद्रोह में शामिल युवाओं के परिवार कहते हैं—“हमें राजनीति नहीं चाहिए, हमें न्याय चाहिए।” उनकी आँखों में आज भी पिछले वर्ष की शामों का खौफ तैरता है—वे शामें जब उनके बच्चे घर वापस नहीं आए। बांग्लादेश की राजनीति में वर्षों से चल रही दुश्मनी—हसीना बनाम खालिदा, अवामी लीग बनाम बीएनपी, सरकार बनाम छात्र—अब उस मुकाम पर पहुँच चुकी है जहाँ हर संघर्ष एक विस्फोट बन सकता है। ढाका की शामें पहले चाय की दुकानों पर बहस से भरी रहती थीं—अब वहीं सैनिक गश्ती घूमती है और लोग मोबाइल बंद कर जल्दी घर लौट आते हैं। बड़ा सवाल यही है कि अगर फैसले के बाद देश और अशांत हुआ, तो क्या बांग्लादेश अपनी राजनीतिक ध्रुवीकरण की खाई में और नहीं गिर जाएगा? क्या लोकतंत्र इस लड़ाई में टिक पाएगा? क्या छात्र आंदोलन, जो कभी बदलाव का प्रतीक थे, हिंसा का मंच बन चुके हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस देश को एक ऐसी रात मिलेगी जिसमें नागरिक बिना डर के सो सकें? इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल के फैसले की घड़ी धीरे-धीरे नज़दीक आती जा रही है, और बांग्लादेश की धड़कनें हर दिन थोड़ी और तेज़ हो रही हैं। जो देश पहले आर्थिक विकास और स्थिरता के लिए जाना जाता था, आज एक अस्थिर मोड़ पर खड़ा है जहाँ हर फैसला इतिहास बन सकता है—और हर गलती बुरे अंजाम की ओर ले जा सकती है। यह कहानी बांग्लादेश की है, लेकिन यह सिर्फ एक देश की कहानी नहीं—यह सत्ता, विरोध, युवाओं की आवाज़, न्याय की खोज और राजनीति के अंधकार की कहानी है। फैसला जब भी आएगा, वह सिर्फ शेख हसीना की ज़िंदगी नहीं बदलेगा—वह आने वाली पीढ़ियों की राजनीति और बांग्लादेश की आत्मा को भी हमेशा के लिए बदल देगा।
